आखिरी बेंच के अपने नियम थे।
वहाँ कोई गलती से नहीं बैठता था। बैठता था जब तय कर लेता था — कि आगे की बेंच उसके लिए नहीं है। कि टीचर पहले से तय कर चुके हैं कि कौन जवाब देगा। कि पीछे बैठने में एक अलग तरह की आज़ादी है।
रोहन छठी कक्षा से आखिरी बेंच पर बैठता था। अब नौवीं में था।
तीन साल हो गए थे। उसी जगह। उसी कोने में।
जुलाई में एक नई इंग्लिश टीचर आईं।
नाम था मिसेज अय्यर। छोटी थीं। चश्मा लगाती थीं। पहले दिन सबसे एक-एक चीज़ पूछी जो उन्हें पसंद हो।
ज़्यादातर बच्चों ने क्रिकेट बताया। कुछ ने म्यूज़िक। कुछ ने पसंदीदा विषय।
रोहन की बारी आई।
उसने कहा — नक्शे।
क्लास हँसी। बुरी नहीं थी हँसी — बस वैसी जैसी किसी अनोखी बात पर होती है।
मिसेज अय्यर नहीं हँसीं।
उन्होंने रोहन को देखा। "कैसे नक्शे?"
"पुराने," रोहन ने कहा। "भारत के पुराने नक्शे। जब सरहदें अलग थीं।"
एक पल चुप रहीं। "क्लास के बाद मिलो।"
और आगे बढ़ गईं।
रोहन क्लास के बाद गया।
सोचा — शायद कुछ सुनना पड़ेगा। कि क्लास में ऐसे जवाब नहीं देते। कि ध्यान से पढ़ो।
मिसेज अय्यर ने कुछ नहीं कहा।
अपनी मेज़ की दराज़ खोली। एक किताब निकाली। पुराने नक्शे थे उसमें — उपमहाद्वीप के। फोटोकॉपी करके बंधे हुए। कागज़ थोड़े पुराने थे।
"यह मुझे एक किताब मेले में मिली थी," उन्होंने कहा। "सालों से रखी थी। किसी को देने के लिए।"

रोहन को कुछ नहीं सूझा।
"रख लो," उन्होंने कहा। "मुझे याद है इसमें क्या है।"
रोहन साल भर आखिरी बेंच पर ही रहा।
पर इंग्लिश में ध्यान देने लगा। चुपचाप। बिना दिखाए। पीछे से।
साल के अंत में क्लास में इंग्लिश में सबसे ज़्यादा नंबर उसके थे।
मिसेज अय्यर ने कागज़ वापस करते हुए एक पल उसकी आँखों में देखा।
बस इतना।
काफी था।
कुछ टीचर तुम्हें जहाँ बैठे हो वहीं ढूँढ लेते हैं।
आगे आने को नहीं कहते।
बस ऐसा करते हैं कि खुद आना चाहो।