फरवरी में ऐलान हुआ — आगरा जाने की ट्रिप है।
फॉर्म शुक्रवार तक जमा करना था।
आदित्य ने शुक्रवार तक फॉर्म जमा नहीं किया।
भूला नहीं था। फॉर्म मेज़ पर रखा था। चार दिन वहीं रहा। दो बार उठाया। रख दिया। ट्रिप की फीस आठ सौ रुपये थी। पापा से माँगने में एक अजीब सी बात लगती थी। शायद वो कहते — ज़रूरी है क्या? किताब में पहले से पढ़ चुके हो। या शायद न कहते। पर शायद का डर था।
वो बात नहीं करना चाहता था।
सोमवार को मिसेज शर्मा ने पूछा — किसने जमा नहीं किया।
आदित्य ने हाथ उठाया।
उन्होंने कहा — जिन्हें ज़रूरत हो एक दिन और मिल सकता है। कुछ और नहीं कहा। कोई सवाल नहीं पूछा।
उस शाम पापा ने पूछा — स्कूल कैसा था।
आदित्य ने ट्रिप के बारे में बताया। जैसे कोई आम बात हो। कोई रिक्वेस्ट नहीं। बस बताया।
पापा एक पल चुप रहे।
"आठ सौ?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
पापा ने सिर हिलाया। और फिर से अखबार पढ़ने लगे। बस इतना।
अगली सुबह किचन की मेज़ पर आठ सौ रुपये रखे थे।
एक छोटी पर्ची के साथ — रसीद लेना।
ट्रिप वैसी ही रही जैसी स्कूल ट्रिपें होती हैं।
बस शोरगुल वाली थी। खाना ठीक नहीं था। किसी की पानी की बोतल खो गई। गाइड तेज़ बोलता था — पीछे से सुनाई नहीं देता था।
पर सुबह सात बजे ताज महल के सामने खड़ा था।

भीड़ अभी नहीं आई थी। रोशनी धीमी थी। हवा ठंडी थी। संगमरमर गीला था।
आदित्य कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
पापा की याद आई। मेज़ पर रखे आठ सौ रुपये याद आए। वो पर्ची याद आई।
उन्होंने कुछ नहीं पूछा था। कोई बात नहीं की थी।
एक फोटो खींची। ताज महल की नहीं — सबके पास थीं। उसने ज़मीन पर पड़ती लंबी सुबह की छाया की फोटो खींची। भीगा संगमरमर। वो सुबह जो किसी की नहीं लगती थी।
अभी भी कहीं होगी वो फोटो।
कभी-कभी हम डरते हैं माँगने से।
पर पिता का दिल हमेशा तैयार होता है।
बस एक बार बोलना होता है।