दयालु चूहा और धोखेबाज़ साँप पंचतंत्र की एक कहानी है — जो यह बताती है कि भलाई करने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि किसकी भलाई कर रहे हो। दो हज़ार साल पुरानी इस कहानी में एक चूहे की दयालुता उसे बहुत महँगी पड़ती है।
एक खेत में एक चूहा रहता था।
वो दयालु था। पास आने वाली चिड़ियों के साथ खाना बाँटता था। एक बार एक भौंरा उल्टा गिर गया था — उसे सीधा किया था। बस ऐसा ही था — बिना सोचे मदद करने वाला।
एक सर्दी की सुबह उसे अपने बिल के पास एक साँप मिला।
अकड़ा हुआ। ठंड से। मुश्किल से साँस ले रहा था।
चूहे ने देर तक देखा।
वो जानता था साँप क्या करते हैं। वो मूर्ख नहीं था।
पर साँप इतना करीब था मरने के — कि चूहे का मन नहीं माना।
साँप को अंदर लाया। सूखी घास से गर्म किया। थोड़ा खाना दिया। पूरे दिन पास बैठा रहा।
शाम तक साँप ठीक हो गया।
चूहा बिल के दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
साँप उससे तेज़ निकला।

बाहर जाने से पहले ही साँप ने चूहे को लपेट लिया।
"यह क्या?" चूहे ने कहा। "मैंने तुम्हारी जान बचाई।"
"मैं साँप हूँ," साँप ने सीधे कहा। "यही मेरी फितरत है।"
"पर मैंने तुम्हारी मदद की।"
"हाँ," साँप ने कहा। "और मैं उसके लिए आभारी भी हूँ। पर मेरी फितरत नहीं बदलती तुम्हारी दयालुता से। मुझे भूख लगी है। तुम यहाँ हो।"
तभी बाहर से एक नेवले की आवाज़ आई। साँप और चूहे की आवाज़ें सुनकर आया था।
साँप ने छोड़ा। भाग गया।
चूहा देर तक बिल में बैठा रहा।
उसके बाद वो दयालु रहा।
पर यह देखने लगा कि किस पर दया कर रहा है।
दयालुता कभी गलत नहीं होती।
पर यह ज़रूर देखो — किसके साथ कर रहे हो।
कुछ जीव अपनी फितरत नहीं बदल सकते — चाहे तुमने कितनी भी मदद की हो।