जून में बैंगलोर आया।
सामान एक बड़े बैग में था। पता एक कागज़ पर लिखा था। और यह पता नहीं था कि कहाँ से शुरू करें।
शहर शोरगुल वाला था — पर उस तरह से नहीं जैसा सोचा था। घर से ज़्यादा शोर नहीं था। बस अलग किस्म का। ट्रैफिक की आवाज़ें अलग थीं। खाने की खुशबू अलग थी। सब कुछ अलग वक्त पर होता था। ऑटो वाले अलग तरह से बात करते थे। किराने की दुकानें अलग वक्त पर बंद होती थीं। बारिश भी अलग लगती थी — भारी, अचानक, जैसे पूछती नहीं।
कोरमंगला में एक घर की तीसरी मंज़िल पर कमरा था।
मकान मालकिन शांत महिला थीं। पहले दिन बिना कुछ बताए दरवाज़े के बाहर एक छोटा पौधा रख गईं। आठ महीने पानी डाला। कभी नहीं पूछा क्यों दिया था।
पहले दो हफ्ते ठीक रहे।
जैसे नई चीज़ें ठीक लगती हैं — सब अनजाना था तो सब दिलचस्प था। चार गली आगे एक अच्छा फिल्टर कॉफी वाला मिला। पता चला कौन-सी सड़क पहले डूबती है बारिश में। बस का रूट याद हो गया।
फिर नयापन गया।

बस वहाँ रह रहा था।
तीसरे और चौथे महीने में सबसे ज़्यादा फोन किया।
न इसलिए कि कोई तकलीफ थी। बस इसलिए कि शामें लंबी थीं। कमरा चुप था। और उस शहर में जो सब अनजाना था उसमें माँ की आवाज़ एक जानी-पहचानी चीज़ थी।
उन्होंने कभी नहीं बोला कि ज़्यादा फोन आ रहे हैं।
अच्छा लगा यह।
नए शहर में दो बार जाना होता है।
पहली बार जब बैग लेकर पहुँचते हो। पता नहीं होता कुछ। पर्ची पर पता लिखा होता है।
दूसरी बार शांत होती है।
वो सुबह जब आँख खुले और पता हो — बाहर जाते हुए किस तरफ मुड़ना है। दुकानदार का नाम पता हो। हवा से पता चल जाए कि बारिश आने वाली है।
दूसरी बार असली होती है। तकरीबन छह महीने लगते हैं।
बैंगलोर के बाद तीन शहर और बदले।
छह महीने हर बार लगे।