नन्हे सितारे

जो तारे गिने जाते थे

1 मिनट

एक छोटी सी लड़की थी।

उसका नाम था — प्रिया।

हर रात सोने से पहले प्रिया खिड़की के पास आती। कंबल ओढ़ती। तकिये पर लेटती। और ऊपर देखती।

तारे गिनती।

सब नहीं — बस वो जो खिड़की से दिखते थे। जो चमकीले थे। जो टिके रहते थे।

कुछ के नाम भी रख दिए थे। आम के पेड़ के पास वाला मोटा तारा — मोती। एक छोटा टिमटिमाता वाला — छोटू। और जो सबसे पहले हर शाम आसमान में आता था — बस "बड़ा वाला।" अभी तक कोई अच्छा नाम नहीं सोच पाई थी।

दादी कहती थीं — तारे दिन में भी होते हैं।

प्रिया को यकीन नहीं होता था। उसने कितनी बार दिन में देखा था — नीला आसमान था। तारे कहीं नहीं थे।

एक शाम आसमान में बादल आ गए।

घने। काले। पूरा आसमान ढक गया।

प्रिया खिड़की पर आई। नाक टिकाई शीशे पर। देखती रही।

मोती नहीं था। छोटू नहीं था। बड़ा वाला भी नहीं था।

कहीं कोई तारा नहीं।

A small girl presses her nose against a window at night looking sadly at the cloudy sky while her daadi stands beside her with a gentle hand on her shoulder and a warm knowing smile looking at the girl not the sky

वो दादी के पास गई। "दादी, तारे चले गए।"

दादी ने बुनाई नीचे रखी। "आ यहाँ।"

दोनों खिड़की पर आए। बाहर देखा। काले बादल थे।

"गए?" दादी ने पूछा।

"दिख नहीं रहे," प्रिया ने कहा।

दादी ने एक पल सोचा। "किचन का पंखा यहाँ से दिखता है?"

प्रिया ने गर्दन घुमाई। किचन कोने के पीछे था। "नहीं।"

"गया?"

प्रिया ने सोचा। "नहीं। बस दिख नहीं रहा।"

"तो तारों का क्या?" दादी बोलीं।

प्रिया चुप रही। समझ गई।

वापस बिस्तर पर आई।

मोती था — बादलों के पीछे। छोटू था। बड़ा वाला भी था। चमक रहे होंगे — बस दिख नहीं रहे थे।

आँखें बंद हो गईं।

जो दिखता नहीं वो जाता नहीं।
बस थोड़ी देर छुपा होता है।

शुभ रात्रि, नन्हे दोस्त।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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