पापा खत लिखने वाले इंसान नहीं थे।
ज़्यादा बात करने वाले भी नहीं थे। जज़बातों की नहीं। पुरानी बातों की नहीं। जो मुश्किल था उसकी नहीं। वो काम से ज़ाहिर करते थे। चीज़ें ठीक करते थे। वक्त पर आते थे। बिल भरते थे। यही उनके तरीके थे।
जब वो गए तो घर में उनकी पुरानी अलमारी खोली।
पीछे की तरफ एक टीन का डिब्बा था।
अंदर खत थे। चालीस-पचास। एक सूखी रबर बैंड से बंधे थे जो टूट गई थी। सब उनकी लिखावट में। सब पर पता लिखा था। सब बंद नहीं थे। भेजे नहीं गए थे।
दादाजी को खत थे।

मेरे नाना — जो पापा के तेईस साल की उम्र में गए थे। पहले खत दूरी वाले थे। फिर होते-होते करीब होते गए। एक सिर्फ दो लाइनों का था। एक चार पन्नों का था जो बीच वाक्य में रुक गया था। जैसे जो लिखवा रहा था वो अचानक खत्म हो गया।
पापा के भाई को खत थे।
वो लखनऊ में रहते थे। उनसे बात नहीं बनती थी — यह हमेशा से पता था। क्यों नहीं बनती थी यह कभी पूरा नहीं समझा। खत नाराज़ नहीं थे। बस कोशिश कर रहे थे। हर बार थोड़े अलग शब्दों में। कभी सही नहीं हुए। कभी भेजे नहीं गए।
दो खत मेरे नाम थे।
मैंने अभी तक नहीं पढ़े।
वो टीन का डिब्बा अब मेरी अलमारी में है। मुझे पता है वो वहाँ हैं। कुछ सुबहें उन्हें पढ़ने के बारे में सोचता हूँ। फिर थोड़ा और सोचता हूँ। अलमारी बंद कर देता हूँ।
पापा के बारे में सोचता हूँ।
कहीं बैठे हैं। देर रात। या रविवार की सुबह। यह खत लिख रहे हैं। जो बातें ज़ोर से नहीं कह पाते थे उन्हें कागज़ पर उतारने की कोशिश कर रहे हैं। पास आ रहे हैं। और रुक जाते हैं।
हम सबके पास ऐसे खत होते हैं।
ज़्यादातर लोग लिखते भी नहीं।
मुझे खुशी है उन्होंने लिखे। भले ही भेजे नहीं। भले ही मैं अभी पढ़ नहीं सका।
लिखना कुछ तो था।