यादें

दादी का घर

2 मिनट

एक पुराना घर था।

दादी का घर।

उसमें सरसों के तेल और पुरानी लकड़ी की खुशबू थी। और कुछ और भी — जिसका नाम आज तक नहीं रख पाया।

मोहल्ले के हिसाब से बड़ा घर था। दो मंज़िलें। बीच में आँगन। ऊपर छत जहाँ दादी मिट्टी के घड़ों में तुलसी उगाती थीं। सुबह-सुबह कबूतर आते थे। दादी चाहती नहीं थीं। हर रोज़ भगाती थीं। हर सुबह वापस आते थे।

चालीस साल यही चला।

दोनों तरफ से कुछ तो था।

जब मैं चौंतीस साल का था तब दादी गईं। अगले साल घर बिक गया।

बिकने से पहले एक बार गया।

नए मालिक अभी आए नहीं थे। तकनीकी तौर पर अभी भी दादी का घर था। उनकी चीज़ें थीं। उनकी खुशबू थी। उनका वो खास तरीका जिसमें फर्नीचर तीस साल से रखा था।

बड़े कमरे के कोने में स्टील की अलमारी। छत पर वो पतली गद्दी जो दादी को पसंद थी — भले ही हमने मोटी लाकर दी थी। किचन में वो नीची चौकी जिस पर बैठकर खाना बनाती थीं। घुटने दुखते थे खड़े रहने से।

आँगन में बैठा।

A person sits alone on the stone floor of an old Indian courtyard with knees pulled up looking slowly around the empty space in afternoon light while a dry tulsi pot sits in the corner

तुलसी के घड़े थे। सूखे — किसी ने पानी नहीं दिया था। छत की दीवार पर कबूतरों के निशान थे।

याद करने की कोशिश की।

यह जानते हुए कि कर रहा हूँ — हर कमरे में धीरे-धीरे चला। उस तरह की याद बनाने की कोशिश की जो रहे।

यह अजीब काम है जब होश से करो।

जानबूझकर बनाई गई यादें अलग होती हैं। ज़्यादा सही होती हैं पर कम जीवित।

जो खुद आती हैं — सरसों के तेल की खुशबू, कबूतरों की आवाज़, तीसरी सीढ़ी की चरमराहट — वो बिना बुलाए आती हैं। और वो रहती हैं।

मार्च में घर बिका।

दूसरे शहर से परिवार आया। बच्चे हैं उनके। मोहल्ले के ग्रुप पर तस्वीरें देखीं — आँगन की दीवार पीली हो गई है। नया गेट लगा है।

पीले रंग से कोई दिक्कत नहीं। घर में लोग रहने चाहिए।

पर कभी-कभी सोचता हूँ उन बच्चों के बारे में।

उसी आँगन में साइकिल चलाना सीखेंगे। उसी छत पर शाम को बैठेंगे। उन्हें पता नहीं होगा कि पहले कौन था।

कोई वजह भी नहीं है।

घर हमारे नहीं होते।

हम कुछ वक्त के लिए रहते हैं।

और कुछ ऐसा छोड़ जाते हैं जो अगला परिवार देख नहीं सकता।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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