यादें

पापा ने जो सिखाया वो मैंने अपनी बच्ची को सिखाया

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पापा ने मुझे पतंग बाँधना सिखाया था।

उड़ाना नहीं — बाँधना। वो गाँठ जो धागे को ढाँचे से जोड़ती है। तनाव कैसे जाँचें। वो छोटे-छोटे फेरबदल जो तय करते हैं कि पतंग बाईं जाएगी या दाईं। वो इसमें बहुत सावधान थे। गलत बँधी पतंग चाहे हवा कितनी भी अच्छी हो — उड़ती नहीं। बचपन में यह बात इसलिए समझी क्योंकि उन्होंने बताई। सही मायने में इसलिए समझी क्योंकि एक बार खुद गलत बाँधी और पतंग नहीं उड़ी।

पिछले जनवरी में अपनी बेटी के लिए एक पतंग खरीदी।

सात साल की है। तुरंत उड़ाना चाहती थी। छत पर बिठाया और कहा — पहले बाँधते हैं।

वो बेचैन थी। माँ का चेहरा है उसका। और नाना की बेचैनी — जो उनके पास थी जब जवान थे और उनके सत्तर में कहीं खो गई।

गाँठ दिखाई। उसने लगाई। गलत थी। फिर दिखाई। अलग तरह से गलत थी।

A young father watches patiently as his seven-year-old daughter concentrates on tying a knot on a gold and red kite on a rooftop terrace

चालीस मिनट छत पर बैठे रहे — बस पतंग बाँधते हुए। पतंग अभी हवा में नहीं थी। वो झुँझला रही थी। मैं उस तरह से धैर्यवान था जो सालों तक धैर्यहीन रहने के बाद आता है।

पाँचवीं कोशिश में हो गया।

उसने ऊपर देखा — और उसके चेहरे पर कुछ था जो मैंने पहचाना। वो खास संतोष जब कोई चीज़ जो अड़ रही थी — समझ आ जाती है।

एक घंटे पतंग उड़ाई। अच्छी उड़ी। सीधी। सही कोण पर।

पापा ने कुछ नहीं कहा होता। पतंग देखते। एक बार सिर हिलाते। बस इतना।

मैंने कुछ नहीं कहा। पतंग देखी। सिर हिलाया।

मेरी बेटी पहले से आसमान देख रही थी। 

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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