आसमान में बहुत सारे बादल रहते थे।
बड़े बादल। छोटे बादल। सफेद बादल। भूरे बादल।
और सबको बरसना आता था।
पर एक छोटा सा बादल था — गोल मटोल, रूई जैसा।
उसका नाम था छोटू।
और छोटू बरसना नहीं चाहता था।
एक सुबह बड़े भूरे बादल ने कहा — "बरसने का वक्त आ गया।"
"हाँ," छोटू बोला। "पर... क्या हुआ अगर किसी को मेरी बारिश पसंद नहीं आई?"
बड़े बादल ने उसे देखा और कहा — "मतलब?"
"क्या हुआ अगर मेरी बारिश बहुत ठंडी हो? या बहुत तेज़? या गलत जगह गिरे?"
बड़े बादल ने इन बातों के बारे में कभी नहीं सोचा था। "बस बरसो," उसने कहा। और आगे चला गया।
छोटू उड़ता-उड़ता एक खेत के ऊपर पहुँचा।
नीचे एक किसान खड़ा था। धूप से आँखें बचाते हुए ऊपर देख रहा था। उसके खेत सूखे थे। पौधे मुरझाए हुए थे। वो इंतज़ार कर रहा था।
छोटू ने उसे देर तक देखा।
फिर अपने गोल पेट को देखा — जो बारिश से भरा था। उतनी ही देर से।
उसने एक गहरी साँस ली।
और बरस गया।

एकदम सही नहीं था। पहले थोड़ा तेज़, फिर थोड़ा धीमा। कुछ बूँदें टेढ़ी गईं। और एक बहुत बड़ी बूँद सीधे किसान की नाक पर गिरी।
पर खेत ने सारा पानी पी लिया। पौधों ने सिर उठाया। किसान हँसा — और अपना मुँह ऊपर कर लिया।
छोटू को हल्का लगा।
गर्म भी।
और पहले से बहुत अच्छा।
शाम को बड़ा बादल पास से गुज़रा। "देखा मैंने कहा था।"
"हाँ," छोटू बोला। "पर यह मुझे खुद जानना था।"
कभी-कभी हम डरते हैं कि हमसे कुछ गलत हो जाएगा।
पर जब तक कोशिश नहीं करते — पता भी नहीं चलता।
छोटू ने कोशिश की। और पूरा खेत हरा हो गया।
शुभ रात्रि, नन्हे दोस्त।