एक जंगल था।
उस जंगल में एक हाथी रहता था। बड़ा सा। गोल पेट वाला। और बहुत प्यारा।
उसका नाम था — गज्जू।
जंगल में सब उसे जानते थे। चिड़ियाँ उसे देखकर गाती थीं। हिरन के बच्चे उसके पास दौड़कर आते थे। खरगोश उसकी छाया में बैठता था।
पर एक सुबह की बात है।
गज्जू उठा — और अपना नाम याद नहीं रहा।
वो खरगोश के पास गया।
"भाई," उसने कहा, "मेरा नाम याद दिलाओ।"
खरगोश हँसा। "अरे! तुम वही हो ना जिसने मेरे घर के ऊपर से पेड़ हटाया था। बहुत अच्छे हो तुम।"
गज्जू मुस्कुराया। पर नाम याद नहीं आया।

वो चिड़ियों के पास गया।
"मेरा नाम याद है तुम्हें?"
चिड़ियाँ बोलीं — "तुम वही हो जो हमारे लिए जामुन गिराते हो! रोज़!"
गज्जू की आँखें भर आईं। पर नाम अभी भी याद नहीं आया।
तब वो नदी किनारे गया।
वहाँ एक बूढ़ा कछुआ था। बहुत धीमा। बहुत समझदार।
गज्जू उसके पास बैठ गया।
कछुए ने पहले एक आँख खोली।
फिर दूसरी।
मुस्कुराया।
और बोला — "गज्जू। याद आया?"
बस।
नाम सुनते ही सब याद आ गया।
पेड़। जामुन। दोस्त। और वो सब जो अभी भागते हुए आ रहे थे।
गज्जू ने सूँड़ ऊपर उठाई।
और ज़ोर से चिल्लाया — इतनी ज़ोर से कि पूरा जंगल हिल गया।
कभी-कभी हमारा नाम हमें याद नहीं रहता।
पर हमारे दोस्तों को हमेशा याद रहता है।
शुभ रात्रि, नन्हे दोस्त।