नन्हे सितारे

आम का पेड़ और गौरैया

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एक आँगन था। उसमें एक पुराना आम का पेड़ था — इतना घना कि दोपहर की धूप भी उसके नीचे नहीं पहुँच पाती थी। गर्मियों में उस पर इतने आम लगते थे कि डालियाँ झुक जाती थीं।

उस पेड़ पर एक गौरैया रहती थी।

एक सुबह गौरैया इधर-उधर उड़ती हुई उस पेड़ की एक डाल पर आकर बैठ गई। थोड़ी देर चुप रही। फिर धीरे से बोली — "क्या मैं यहाँ घोंसला बना सकती हूँ?"

पेड़ ने अपनी पत्तियाँ हिलाईं। जैसे कह रहा हो — "बिल्कुल। ये डालियाँ तुम्हारी भी हैं।"

गौरैया ने काम शुरू किया।

सूखी घास, रूई के टुकड़े, कुएँ के पास से मिले रंग-बिरंगे धागे — सब कुछ जोड़-जोड़कर उसने एक छोटा सा घर बनाया। इतना आरामदेह कि देखने वाला भी सोचे — काश, मेरा घर भी ऐसा होता।

जल्दी ही उस घोंसले में तीन अंडे आ गए।

गौरैया दिन-रात वहीं बैठी रहती। सुबह धीमे-धीमे गाती, रात को उनसे बातें करती। बारिश हो या आँधी — वो नहीं हिलती थी।

एक दोपहर, पड़ोस की एक छोटी बच्ची भागती हुई आँगन में आई। पेड़ के नीचे खड़ी होकर ऊपर देखने लगी।

"दादी, ये क्या है?"

दादी पास आईं। मुस्कुराईं। "घोंसला है। उसमें अंडे हैं। वो गौरैया माँ बनने वाली है।"

बच्ची बहुत देर तक चुप खड़ी रही। गौरैया भी उसे देखती रही।

दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया — जैसे पहले से जानते हों।

और फिर एक सुबह — तीनों अंडों में से आवाज़ें आने लगीं।

धीरे-धीरे। फिर एक साथ।

तीन नन्ही-नन्ही चोंचें बाहर निकलीं — खुली हुई, भूखी, और ज़िंदगी से भरी हुई।

Young Indian girl with gold bangles smiling at three newly hatched baby sparrows in a nest tucked within a sunlit mango tree

उस दिन आँगन में बहुत शोर था। गौरैया का, बच्ची का, और उस पेड़ का — जिसने अपनी सारी पत्तियाँ एक साथ हिला दी थीं।

जब गर्मियों में आम पके, तो उस परिवार ने आँगन में बैठकर उन्हें खाया। ऊपर से बच्चे उड़ना सीख रहे थे — फड़फड़ाते, गिरते, फिर उठते।

पेड़ खुश था।

क्योंकि उसकी डालियाँ सिर्फ आम नहीं देती थीं — घर भी देती थीं।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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