विक्रम का एक सिस्टम था।
कॉमिक जियोग्राफी की किताब के अंदर। किताब चैप्टर चार पर खुली। आँखें बोर्ड और कॉमिक के बीच एक लय में — ऊपर, नीचे, ऊपर, नीचे — जो उसने तीन साल में परफेक्ट की थी। आगे से देखने पर लगता था जैसे पढ़ रहा है।
पढ़ नहीं रहा था।
एक जासूस की कहानी पढ़ रहा था जो कबूतरों से बात कर सकता था। सीरीज़ का चौथा अंक था। अब तक का सबसे अच्छा।
जियोग्राफी की टीचर — मिसेज सिन्हा — बाईस साल से पढ़ा रही थीं। यह सिस्टम उन्होंने हर रूप में देखा था। किताब के अंदर नॉवेल। पेंसिल बॉक्स में फोन। डेस्क के ढक्कन में शीशा।
उन्होंने विक्रम को ग्यारह मिनट पढ़ने दिया। फिर उसका नाम लिया।
"विक्रम। गंगा की तीन सहायक नदियाँ बताओ।"
क्लास चुप हो गई।
विक्रम ने ऊपर देखा। फिर — खुद भी हैरान होते हुए — जवाब दिया। "यमुना, घाघरा, गंडक।"
मिसेज सिन्हा ने एक पल उसे देखा। "सही।" और बोर्ड की तरफ मुड़ गईं।
क्लास के बाद उन्होंने दरवाज़े पर रोका। हाथ आगे किया। उसने कॉमिक दे दी।
उन्होंने उसे देखा। "यह सीरीज़ मैंने पढ़ी है। पाँचवाँ अंक बेहतर है।"
वापस करके चली गईं।
विक्रम कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
बस से घर जाते हुए चौथा अंक खत्म किया। मिसेज सिन्हा के बारे में कॉमिक से ज़्यादा सोचा।
कुछ टीचर जो नहीं कहते — उससे ज़्यादा सिखाते हैं।