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A student's desk late at night with colour-coded notebooks, laminated revision sheets, and an untouched glass of warm milk under a dim lamp

आखिरी परीक्षा

बोर्ड की आखिरी परीक्षा से एक रात पहले, अर्जुन को नींद नहीं आई।

उसने पढ़ा था। यह वो जानता था। ज़िंदगी में किसी भी चीज़ से ज़्यादा पढ़ा था। नोटबुक रंगों से सजी थीं। रिवीज़न शीट लैमिनेट थीं। पाँच साल के पेपर दो-दो बार किए थे।

फिर भी कुछ नहीं हुआ।

अँधेरे में लेटा था और हर वो सवाल सोच रहा था जो नहीं आएगा। पापा का चेहरा सोच रहा था — रिज़ल्ट के अगले दिन नाश्ते की मेज़ पर। एक लड़के के बारे में सोच रहा था — रोहित — जिसे सब कुछ आसान लगता था, जो कभी पढ़ता नहीं दिखता था और फिर भी रैंक ले आता था।

साढ़े ग्यारह बजे अम्मा ने दरवाज़ा खटखटाया। गर्म दूध लेकर आईं।

परीक्षा का एक लफ्ज़ नहीं बोला। बस बिस्तर के किनारे बैठ गईं।

A teenage boy lies awake in a dim bedroom while his mother sits calmly on the edge of the bed beside a desk stacked with colour-coded notebooks

पूछा — याद है एक बार बरेली में शादी पर जाते हुए रास्ता भटक गए थे? एक छोटे से कस्बे में निकले थे। एक घर वालों ने चाय पिलाई। दो घंटे बैठे रहे। उस साल का सबसे अच्छा दिन था।

अर्जुन ने कहा — याद है।

अम्मा ने कहा — "जब कोई बात बहुत बड़ी लगती है, मैं उसी दिन को याद करती हूँ।"

दूध रखकर चली गईं।

अर्जुन ने धीरे-धीरे दूध पिया। उस कस्बे के बारे में सोचा। घर का कुत्ता जो उसके पैरों पर सो गया था। पापा की हँसी। बहुत मीठी चाय।

नींद आ गई।

अगली सुबह परीक्षा दी। सब याद नहीं रहा। कुछ सवाल अजीब लगे। एक पूरा हिस्सा मुश्किल था।

बाहर निकला तो अम्मा को फोन किया।

"कैसी रही?"

"पता नहीं," उसने कहा। फिर — "ठीक रही शायद।"

ठीक ही रही। परफेक्ट नहीं। पर ठीक।

जो कि, पता चला, काफी था। 

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