किसी ने नहीं बताया कि यह आखिरी दिन है।
मतलब — पता था। कैलेंडर पर था। हफ्तों से गिन रहे थे। पर किसी दिन के आखिरी होने का पता होना और उसे महसूस करना — एक जैसा नहीं है। और जब तक महसूस हुआ, हो चुका था।
एक-दूसरे की शर्ट पर साइन किए।

ऐसे ग्रुप में फोटो खिंचवाए जो फिर कभी एक साथ नहीं होंगे। वादे किए — हर महीने मिलेंगे, फिर हर साल, फिर दस साल बाद — उन लोगों के यकीन के साथ जिन्होंने अभी तक किसी को खोया नहीं।
याद है — चार बजकर तीस मिनट पर स्कूल के गेट पर खड़ा था। पापा के आने का इंतज़ार। बाकी सब जा चुके थे। ड्राइववे खाली था। एक चपरासी बरामदे में झाड़ू लगा रहा था।
बारह साल। चार हज़ार से ज़्यादा दिन। और अब बस एक गेट, एक झाड़ू, और हवा में खड़िया की खुशबू।
पापा देर से आए। दो बार हॉर्न बजाया। मैं गाड़ी में बैठ गया।
"हो गया?" उन्होंने कहा।
"हो गया," मैंने कहा।
वो चलाते रहे। मैं खिड़की से बाहर देखता रहा। हम नहीं बोले।
घर आकर कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद किया तब रोया। ज़्यादा नहीं। और ठीक-ठीक पता नहीं था किसलिए — दुख नहीं था, बल्कि वो अजीब सा एहसास जब कोई चीज़ जो हमेशा से थी — बस नहीं रहती।
उन लोगों से कभी-कभी मिलना होता है। साल दर साल कम होता जाता है। महीने में एक बार की मुलाकातें साल में एक बार हुईं। फिर कभी-कभी। फिर बर्थडे मैसेज। फिर खामोशी।
पर वो शर्ट अभी भी है। माँ-पापा के घर में एक डिब्बे में रखी है। सबके नाम — नीले, काले, और एक बहुत उम्मीद भरे लाल रंग में।