बचपन डायरीज़ परिवार यादें 🌐 Read in English
Two pairs of hands at an Indian kitchen stove — an older woman guiding a younger one, a pot of dal steaming between them in warm morning light

अम्मा से खाना सीखना

अम्मा ने कभी नाप कर नहीं डाला।

एक मुट्ठी यह। थोड़ा सा वो। जब तक खुशबू सही न आए तब तक पकाओ।

मैं उनकी किचन में सालों खड़ा होकर देखता रहा। कुछ समझा नहीं। जानकारी सब वहाँ थी — हाथ दिखते थे, क्या डाला दिखता था, कब चलाया दिखता था। पर जो उनके हाथों में था — वो देखने से नहीं आता। यह अब पता है।

जिस साल मैं छब्बीस का हुआ — उनसे उनकी दाल सिखाने को कहा।

उन्होंने कहा — यहाँ आ खड़े हो।

सब कुछ मुझसे करवाया। देखने नहीं दिया। करने दिया। हाथ पकड़कर दिखाया कितना जीरा।

An older woman guides a younger person's hand toward a steaming pot of dal at an Indian kitchen stove in warm morning light

प्याज़ को अलग-अलग वक्त पर सुँघवाया — ताकि खुशबू से पता चले कब तैयार है। जब ज़्यादा पानी डाल दिया तो नहीं बताया — बस देखने दिया कि क्या हुआ और खुद समझने दिया कि गलत क्यों हुआ।

एक पतीली दाल में पूरी सुबह लगी।

अंत में उन्होंने चखा। कुछ नहीं बोलीं। जो उनका "अच्छा है" होता है।

अब वो दाल मैं बनाता हूँ। बिल्कुल वैसी नहीं — थोड़ा अलग है मेरी। थोड़ा ज़्यादा जीरा। प्याज़ की टाइमिंग थोड़ी अलग। यह दाल है जैसे मुझसे होकर गुज़री।

एक बार वो घर आईं तो चखा।

बोलीं — "अब यह तुम्हारी दाल है।"

दो साल से उस बात के बारे में सोच रहा हूँ। कोई चीज़ मिलती है और अपनी होती है — इसका मतलब क्या है। क्या खो जाता है। और क्या, किसी तरह, बच जाता है। 

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