बचपन डायरीज़

घर का डब्बा

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पहली बार जब अम्मा ने डब्बा भेजा, मैं बाईस साल का था।

दिल्ली में एक पेइंग गेस्ट में रहता था जिसमें सीलन और किसी और के खाने की खुशबू थी।

डब्बा कूरियर से आया — एक स्टील का टिफिन। अखबार में लपेटा, फिर एक पॉलिथीन में, फिर दूसरी पॉलिथीन में। जैसे अंदर कुछ नाज़ुक हो। था नहीं — पर अम्मा हर खाने को नाज़ुक मानती हैं।

अंदर — दाल मखनी, फॉयल में रोटी, एक छोटी डिब्बी में अचार, और — कोने में — चार डाइजेस्टिव बिस्किट एक ज़िपलॉक बैग में। क्योंकि उन्हें पता है मैं रात दस बजे चाय के साथ बिस्किट खाता हूँ।

बिस्तर पर बैठकर ठंडी दाल खाई — किचन तक जाने में मकान मालकिन से मिलना पड़ता। रोटी थोड़ी सख्त हो गई थी। अचार बिल्कुल सही था।

A young man sits alone on a simple bed in a sparse room eating dal from an open steel tiffin by the light of a single dim bulb

बाद में अम्मा को फोन किया।

"मिल गया?"

"हाँ।"

"दाल ठीक थी? मुझे दाल की फिक्र थी।"

दाल ठीक थी। दाल बहुत अच्छी थी। दाल तीन हफ्तों में पहली चीज़ थी जो कुछ जानी-पहचानी लगी।

यह नहीं कहा। बस बोला — "हाँ दाल अच्छी थी।" उन्होंने कहा — "मैंने ज़्यादा मक्खन डाला था।" मैंने कहा — "पता चला।" फिर ग्यारह मिनट बेकार की बातें हुईं। फिर रात हो गई।

फोन रखने के बाद अँधेरे में बैठा रहा। बाहर दिल्ली वैसे ही थी — शोर, बेफिक्र, इस बात से बेखबर कि मैं बाईस साल का था, घर से दूर था, और स्टील के टिफिन से ठंडी दाल खा रहा था।

बिस्किट अभी भी ज़िपलॉक में थे। दस बजे के लिए बचाए। ✦

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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