नन्हे सितारे

गुड़िया और चाँद

1 मिनट
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रात होती थी तो गुड़िया चाँद से बात करती थी।

बोलती नहीं थी — बस मन में। अपना कंबल ठीक करती, तकिये पर लेट जाती, और खिड़की से बाहर देखती। चाँद दिखता तो आँखें बंद हो जाती थीं।

पर एक रात चाँद नहीं था।

गुड़िया ने खिड़की पर नाक टिकाई। कुछ नहीं। बस काला आसमान और कुछ तारे जो चाँद जैसे नहीं थे।

वो अम्मा के पास गई।

"अम्मा, चाँद कहाँ गया?"

अम्मा कपड़े तह कर रही थीं। "बादलों के पीछे है। वापस आएगा।"

"पर अगर नहीं आया तो?"

अम्मा मुस्कुराईं। "हमेशा आता है।"

गुड़िया वापस बिस्तर पर आ गई। पर नींद नहीं आई।

उसने इंतज़ार करने की ठानी।

काफी देर इंतज़ार किया। इतनी देर कि अम्मा ने सारे कपड़े तह कर लिए। घर में सब सो गए। एक बादल आया, निकल गया। फिर दूसरा।

और तब — धीरे से — आसमान के एक कोने में रोशनी आई।

पहले एक हल्की सी चमक।

फिर एक कोना।

फिर पूरा चाँद — गोल, चमकदार, वहीं का वहीं।

A little girl lying in bed smiles with relief as the full moon reappears outside her window in the dark night

गुड़िया ने लंबी साँस ली।

"आ गए," उसने धीरे से कहा।

चाँद ने कुछ नहीं कहा। वो कभी कुछ नहीं कहता। पर रात भर वहीं रहा — शांत, स्थिर।

बस इतना काफी था।

कभी-कभी जो चीज़ें हम चाहते हैं वो थोड़ी देर के लिए छुप जाती हैं।

पर इंतज़ार करो — वो वापस आती हैं।

शुभ रात्रि, नन्हे दोस्त।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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