यादें

पुराना मोहल्ला

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पिछले साल वापस गया।

नहीं पता था क्या उम्मीद थी। मोहल्ला तीस साल बड़ा हो गया है। मैं भी। दोनों बदले हैं — पर एक जैसे नहीं।

जिस घर में पला-बढ़ा वो अब हल्के नीले रंग का है — हमेशा सफेद था। गेट पर एक अनजानी गाड़ी। और गुलमोहर का पेड़ — जो हर मई सीढ़ियों पर फूल गिराता था — कट चुका है। ठूँठ सफेद रंगा है।

A person stands with their back to the viewer looking at a freshly repainted light blue house in a quiet narrow Indian lane

कुछ देर बाहर खड़ा रहा। पीछे से कुत्ते ने भौँका। एक बच्चे की साइकिल दीवार से टिकी थी।

जो परिवार अब रहता है उसका एक बच्चा है। वो बच्चा उसी ड्राइववे में साइकिल चलाता है जहाँ मैं खड़िया से लकीरें खींचता था। उसे शायद पता नहीं कि कभी खड़िया की लकीरें थीं। कोई वजह भी नहीं कि पता हो।

मोहल्ले में एक घंटे चला।

जहाँ टॉफी की दुकान थी वहाँ अब मोबाइल रिपेयर की। पार्क नया है — नई बेंचें, नए झूले। स्लाइड के पीछे कीचड़ वाली जगह — जहाँ हम खेलते थे — उसका कोई निशान नहीं। स्कूल की जगह नई बिल्डिंग है।

कुछ चीज़ें वैसी ही थीं। दोपहर में प्रेशर कुकर की सीटी। इन संकरी गलियों में दोपहर की धूप का वो खास अंदाज़। एक बूढ़े चाचाजी चारपाई पर बैठे — जैसे हमेशा से बैठते रहे हैं।

दुख नहीं लगा, ठीक-ठीक। कुछ और लगा — यह समझ कि जो मोहल्ला मेरे बचपन का था, वो अब सिर्फ मेरे अंदर है। बाहर वाला आगे बढ़ गया। जैसे जगहें बढ़ती हैं।

एक फोटो खींची। किसी खास चीज़ की नहीं। बस गली की।

तब से नहीं देखी। 

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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