यादें

पुराने घर की आखिरी दिवाली

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The Last Diwali at the Old House

उस वक्त नहीं पता था कि यह आखिरी दिवाली है।

ऐसी बातें पहले से नहीं बताई जातीं।

 घर पुराने शहर की एक तंग गली में था। ऐसी गली जहाँ पड़ोसी का प्रेशर कुकर सुनाई देता था — और अपना उन्हें। घर पहले दादाजी का था। फिर पापा का। और यह दुनिया की इकलौती जगह थी जहाँ अँधेरे में भी पता रहता था कि कहाँ हूँ। 

उस अक्टूबर हम पाँच थे।

पापा, माँ, छोटी बहन, चाचा और चाची। कुछ कज़िन नहीं आ पाए — पढ़ाई थी, दूरी थी, एक नया बच्चा था जो सफर के लिए अभी छोटा था। घर उस साल थोड़ा खाली लग रहा था।

पापा घर में ऐसे चल रहे थे जैसे चीज़ों को हल्के से छू रहे हों। जैसे अपने मन में कुछ अलविदा कह रहे हों — बिना किसी को बताए।

दोपहर में दिये बनाए।

बाज़ार से लाए मिट्टी के दिये — सौ। धोए, सुखाए, तेल भरा, रुई की बातियाँ डालीं। माँ और चाची आँगन में बैठकर काम करती रहीं। आपस में बातें होती रहीं — कोई ख़ास बात नहीं, बस वो वाली बातें जो होती रहती हैं।

मैं थोड़ी देर उनके पास बैठा। फिर अंदर गया — पापा को लाइटें लगाने में मदद करने।

लाइटें पुरानी थीं।

बड़े रंगीन बल्बों वाली। LED नहीं — वो वाली जो हाथ में पकड़ो तो गर्म लगती थीं। लाल, हरी, नीली। दिवाली के वो रंग जो मैं हमेशा से जानता था। कुछ बल्ब सालों में जल चुके थे और जो मिले वो लगा दिए थे — इसलिए माला थोड़ी अजीब सी थी। पापा को यह अच्छा लगता था। माँ को नहीं।

हमने माला छत की मुँडेर पर और दरवाज़े के ऊपर लगाई। शाम को जब जलाई — घर वैसा ही दिखा जैसा हमेशा दिखता था। बचपन वाला घर। हर दिवाली वाला घर।

अँधेरा होते-होते दिये जलाए।

हर चौखट पर, हर सीढ़ी पर, हर खिड़की पर। सौ छोटी-छोटी लौें — गली की हवा में काँपती हुईं पर बुझती नहीं थीं।

छत से देखो तो सब एक साथ दिखते थे।

मैं वहीं खड़ा रहा — काफी देर। इतनी देर कि बहन ढूँढती हुई आ गई। हम दोनों चुप खड़े रहे।

रात दस बजे खाना हुआ।

खीर, पूरी, आलू की सब्ज़ी। और एक मिठाई जो चाचा बाज़ार से लाए थे — एक दुकान जो साठ साल से वही बर्फी बना रही थी। दरी पर बैठकर, स्टील की थालियों में। बातें होती रहीं — पुरानी, नई, और वो वाली जो परिवार में उन रातों को होती हैं जब सब जानते हैं कि कुछ खत्म होने वाला है।

अगले साल वसंत में घर बिक गया।

कारण थे — व्यावहारिक, समझदारी वाले, बड़ों वाले कारण। जो मैं समझता हूँ। और जिन्हें पूरी तरह माफ नहीं कर पाया।

नए लोगों ने सब कुछ सफेद रंग से पुतवा दिया।

पता नहीं वो दिवाली मनाते हैं या नहीं। शायद मनाते हों। रोशनी घर ढूँढ लेती है — चाहे उसमें कोई भी रहे।

पर वो दिये मेरे पास हैं।

सौ छोटी-छोटी लौें — एक ऐसे घर की चौखटों पर काँपती हुईं जो अब नहीं है।

बुझी नहीं हैं।

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Manoj Rajput