बचपन डायरीज़
परिवार यादें
A child's cricket bat and rubber ball lying abandoned on a warm sunlit Indian floor with faint chalk stapu squares drawn nearby — mid-game — on a summer afternoon

दोपहर का खाना

1 मिनट

उस गर्मी में हम चार बच्चे एक साथ थे।

रिया, पिया, हर्ष भैया, तुष्टि दीदी।

बुआजी आई थीं। घर चहल-पहल से भर गया था।


सुबह से खेलते रहे।

बैट-बॉल। स्टापू। छुपा-छुपी। घर के कोने-कोने में। कूलर की ठंडी हवा कमरे में घूमती रही — वो खास गर्मियों वाली महक जो सिर्फ बचपन में आती है और बड़े होने के बाद कहीं खो जाती है।

दोपहर होते-होते चारों ढेर हो गए।

जहाँ थे वहीं सो गए।


मम्मी और बुआजी ने देखा — चारों सो गए हैं। खाना नहीं खाया।

उन्होंने एक-एक को धीरे से जगाया। सोफे के पास बिठाया। थाली सामने रखी। खिलाया। और वापस सुला दिया।

कोई शोर नहीं। कोई हड़बड़ी नहीं।

हम लोगों को शायद पता भी नहीं चला कि हमने खाया कब — नींद में थे या होश में, याद ही नहीं रहा।


शाम को सब उठे।

धूप कम हो गई थी। कूलर अभी भी चल रहा था। बाहर से चिड़ियों की आवाज़ें आ रही थीं।

हर्ष भैया ने इधर-उधर देखा। फिर बोले —

"आपने मुझे खाना तो दिया ही नहीं।"

"भैया, खाया तो था आपने।"

"कब खाया? मैं तो सो रहा था।"

"इसीलिए तो — मम्मी ने उठाकर खिलाया था।"

"नहीं।" हर्ष भैया बिल्कुल convinced थे। "मुझे याद नहीं। मैंने नहीं खाया।"


एक हँसा तो सब हँसे। घर गूँज गया।

बस हर्ष भैया बिल्कुल पक्के थे।

"मैं तो सो रहा था। मैंने कब खाया?"
A boy sits with arms crossed on a sofa completely convinced while two girls laugh expressively and a tiny toddler giggles along in a warm Indian living room in the eveningउस शाम की याद आज भी आती है।

कूलर की महक। सोफे के पास बैठकर खाना। हर्ष भैया का वो चेहरा — बिल्कुल पक्का कि उन्होंने खाया ही नहीं।

और मम्मी — जिन्होंने चारों को जगाया, खिलाया, सुलाया। चुपचाप। बिना किसी को पता चले।

कुछ चीज़ें इतनी चुपचाप होती हैं कि याद नहीं रहतीं।

पर वो हुई थीं।

Priyanka

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