किस्से कहानी

नीली साइकिल

2 मिनट
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The Blue Bicycle

साइकिल पहले पापा की थी।

हीरो रेंजर। नीले रंग की। बाईं तरफ के पैडल के पास एक छोटी सी ज़ंग की जगह थी जो पापा ने कभी ठीक नहीं करवाई।

अर्जुन तेरह साल का था जब एक शनिवार की सुबह पापा ने कहा — "अब यह तेरी है।"

बस इतना। कोई बड़ी बात नहीं। कोई समारोह नहीं।

पापा सब ज़रूरी बातें ऐसे ही कहते थे — जैसे आम बात हो। जबकि होती नहीं थी।

अर्जुन को साइकिल चलानी नहीं आती थी।

तेरह साल में यह मानना शर्मनाक था। उसके सारे दोस्त आठ साल से चला रहे थे। स्कूल के पीछे वाली ढलान पर दौड़ लगाते, पार्क में अगला पहिया उठाते।

अर्जुन के पास हमेशा कोई न कोई बहाना होता था — होमवर्क है, घुटना दर्द है, कुछ और है।

सच बस इतना था — उसे गिरने से डर लगता था।

पापा ने कॉलोनी की गली में सिखाना शुरू किया। हर शाम।

पहले सीट पकड़कर साथ-साथ दौड़ते। फिर धीरे से छोड़ देते — एक बार, दो बार, फिर हर बार — जबकि अर्जुन को लगता रहता कि हाथ अभी भी है।

एक शाम अर्जुन को अचानक एहसास हुआ — पापा बीस मीटर पीछे खड़े हैं। और वो अकेला चला रहा है।

कुछ हुआ उस पल।

सिर्फ बैलेंस नहीं आया — कुछ और भी। यह लगा कि शायद हम जितना सोचते हैं उससे आगे पहुँच चुके होते हैं। और जो थामे रखता है — वो दिखे न दिखे, होता है।

अर्जुन गली के आखिर तक गया। फिर वापस आया। बिना रुके।

पापा वहीं खड़े थे जहाँ छोड़ा था। हाथ बँधे हुए। चेहरे पर मुस्कान नहीं थी — पर उससे गर्म कुछ था।

बस इतना बोले — "देखा।"

A boy joyfully riding a vintage blue Hero Ranger bicycle down a street at sunset while his father proudly watches from the sidewalk.

उसी साल पापा का तबादला हो गया।

पहले हफ्ते में एक बार आते। फिर कम। फिर और कम।

कॉलोनी की गली अर्जुन की अपनी हो गई।

साल बीते। साइकिल छोटी पड़ गई। अर्जुन बड़ा हो गया।

पर जब भी कहीं कोई नीली साइकिल दीवार से टिकी हुई दिखती — एक पल के लिए दो चीज़ें एक साथ होतीं।

उस शाम की खुशी — जब पहली बार अकेले चला था।

और यह समझ — कि जिस पल तुम संभल जाते हो, उसी पल वो हाथ छूट चुका होता है जिसने सिखाया था।

अर्जुन को लगता था यह दुखद नहीं है।

यही बड़े होना है।

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