बचपन डायरीज़

एक पुरानी तस्वीर

2 मिनट

कुछ और ढूँढते हुए मिली।

ऐसा ही होता है इन चीज़ों के साथ। माँ-पापा के घर में एक पुराना डिब्बा था — सर्टिफिकेट, रिपोर्ट कार्ड, पुराने बिल, एक बर्थडे कार्ड जिस पर नाम लिखा था पर याद नहीं वो कौन था। उसी के नीचे एक तस्वीर थी।

परिवार की तस्वीर। सब साथ — माँ, पापा, छोटी बहन, और मैं। मैं नौ-दस साल का रहा होऊँगा। बहन शायद छह की।

यह तस्वीर कब खिंची थी याद नहीं था। मौका भी याद नहीं था।

A person sits on the floor in afternoon light holding an old faded photograph in both hands with a thoughtful surprised expression while an open box and scattered papers surround them

एक घर के सामने खड़े थे जो पहचाना नहीं तुरंत।

पापा का हाथ मेरे कंधे पर था। माँ कैमरे को देख रही थीं उस खास अंदाज़ में जो तस्वीरों में होता है — न पूरी मुस्कान, न बिना मुस्कान, कुछ बीच का। बहन किसी और तरफ देख रही थी — वैसे ही जैसे हमेशा।

मैं आँखें सिकोड़े था।

पापा का चेहरा देर तक देखा।

इस तस्वीर में वो मुझसे छोटे थे। यह बात अजीब थी। माँ-बाप एक वक्त जवान थे — यह तो पता था। पर जानना और तस्वीर में देखना एक जैसा नहीं है।

वो खुद जैसे लग रहे थे। पर हल्के। जैसे अभी तक चेहरे में पूरी तरह बसे नहीं थे।

उस शाम माँ से पूछा।

उन्होंने देखा। बोलीं — यह लखनऊ में पापा के बचपन के घर के बाहर है। बिकने से पहले की। कहा — तुम वहाँ एक बार गए थे पर याद नहीं होगा, बहुत छोटे थे।

फिर से तस्वीर देखी।

पापा ने उस घर के बारे में कभी कुछ नहीं बताया था। एक बार भी नहीं।

उस शाम ज़्यादा नहीं पूछा। कुछ बातें अपनी होती हैं। महसूस होता है कि ज़्यादा पूछना ठीक नहीं।

पर तस्वीर रख ली।

अब बटुए में है। एक कोना मुड़ा हुआ है। रंग थोड़ा फीका पड़ गया है।

जब देखता हूँ तो सोचता हूँ उस पापा के बारे में जो मुझसे छोटे थे। जो एक घर के बाहर खड़े थे जो जल्द ही उनका नहीं रहेगा। और उनका हाथ मेरे कंधे पर था।

कुछ तस्वीरें यादें नहीं होतीं।

वो उन चीज़ों के सबूत होती हैं जो तब हुई थीं — जब हम समझने लायक नहीं थे।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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