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खरगोश और तालाब का चाँद

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खरगोश और कुएँ का चाँद पंचतंत्र की एक चतुर कहानी है — जो यह बताती है कि जब ताकत न हो तो दिमाग से काम लो। दो हज़ार साल पुरानी इस कहानी में एक छोटा खरगोश एक बड़े हाथी के झुंड को सिर्फ अपनी समझदारी से रोक देता है।

एक जंगल में हाथियों का एक बड़ा झुंड रहता था।

उनका मुखिया था एक बड़ा हाथी — ताकतवर, समझदार, फैसला करने वाला। जब वो कुछ तय करता — पूरा झुंड मानता।

उस साल बारिश कम हुई थी। तालाब सूखने लगे थे। झुंड प्यासा था।

मुखिया ने जंगल में एक नया तालाब ढूँढा। ठंडा। भरा। साफ। झुंड को वहाँ ले गया।

पर उस तालाब के किनारे खरगोशों की एक बड़ी बस्ती थी। हाथियों को दिखते नहीं थे — बहुत छोटे थे, बहुत चुप थे। हर रोज़ झुंड आता। पानी पीता। नहाता। और दर्जनों खरगोश रौंदे जाते — बिना किसी को पता चले।

खरगोश परेशान थे। हाथियों से लड़ नहीं सकते थे। रोक नहीं सकते थे। पर यूँ भी नहीं चल सकता था।

एक खरगोश आगे आया। उसका नाम था — चतुर।

छोटा था। बस्ती में सबसे छोटा। पर एक खास किस्म की शांति थी उसमें जिस पर बाकी भरोसा करते थे।

"मैं हाथी के मुखिया से बात करूँगा," उसने कहा।

बाकी खरगोशों ने उसे देखा।

"तुम कुचल जाओगे," एक ने कहा।

"शायद," चतुर बोला। "पर मेरे पास एक तरकीब है।"

वो तालाब के पास एक बड़े पत्थर पर जा बैठा। हाथी के मुखिया का इंतज़ार किया।

जब मुखिया आया — चतुर ने आवाज़ लगाई। छोटी थी पर साफ थी।

"रुको।"

मुखिया ने नीचे देखा। खरगोश मुश्किल से दिखा।

"कौन हो?" मुखिया ने कहा।

"मैं एक संदेशवाहक हूँ," चतुर ने ध्यान से कहा। "चाँद का संदेशवाहक।"

मुखिया रुक गया।

"चाँद का?" उसने कहा।

"हाँ। यह तालाब चाँद का है। तुम्हारे झुंड ने उसे परेशान किया है। चाँद नाराज़ है। आओ — मैं दिखाता हूँ।"

रात को चतुर हाथी के मुखिया को तालाब के किनारे ले गया।

चाँद पानी में साफ दिख रहा था। पूरा। शांत।

Ek chota khargosh raat mein jungle ke talaab ke paas ek patthar par shanti se khada hai — saamne ek vishaal haathi khada hai — beech mein talaab mein chaand ka akss chamak raha hai — akar ka fark zabarjast hai par khargosh bilkul nahi darta

"वो देखो," चतुर ने कहा। "चाँद खुद। देखो कैसे काँप रहा है — यह उसका गुस्सा है।"

मुखिया ने देखा। सूँड़ पानी की तरफ बढ़ाई।

पानी में लहर उठी। चाँद का अक्स टूट गया।

"फिर परेशान कर दिया," चतुर ने धीरे से कहा। "अब और आए तो बहुत बुरा होगा।"

मुखिया टूटे हुए अक्स को देखता रहा। देर तक सोचता रहा।

फिर मुड़ा। झुंड को वापस ले गया।

वो तालाब पर फिर कभी नहीं आए।

खरगोश वहाँ सालों तक सुकून से रहे।

बड़े होने की ज़रूरत नहीं हमेशा।
बस थोड़ा ज़्यादा समझदार होना होता है।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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