कौआ और साँप पंचतंत्र की सबसे मशहूर कहानियों में से एक है — जो यह बताती है कि ताकत न हो तो दिमाग से काम लो। दो हज़ार साल पुरानी यह कहानी आज भी उतनी ही तीखी है।
एक गाँव के किनारे एक बड़ा बरगद का पेड़ था।
उसकी ऊँची डालों पर एक कौआ और उसकी पत्नी कौई का घोंसला था। सालों से वहीं रहते थे। सुकून था। सब ठीक था।
पेड़ की जड़ों के पास एक साँप रहता था।
हर साल जब कौआ-कौई अंडे देते — साँप ऊपर चढ़ आता और अंडे खा जाता। कौआ कुछ नहीं कर सकता था। साँप से लड़ने की ताकत नहीं थी। घोंसला ऊँचा बनाया — साँप वहाँ भी पहुँच गया। पहरा दिया — साँप तब आता जब वो दोनों गए होते।
हर साल यही होता। हर साल घोंसला खाली हो जाता।
कौआ अपने दोस्त सियार के पास गया। सब बताया।
सियार ने ध्यान से सुना।
"साँप से लड़ नहीं सकते," सियार ने कहा। "पर लड़ने की ज़रूरत नहीं। किसी और से लड़वाओ।"
और उसने तरकीब बताई।
अगली सुबह कौआ गाँव के ऊपर उड़ा।
राजा का बगीचा था। दोपहर को राजपरिवार वहाँ आता था। एक राजकुमारी तालाब में नहा रही थी — उसके कपड़े और गहने किनारे रखे थे। दो सेविकाएँ पास में थीं।
कौए ने झपट्टा मारा। सोने का हार चोंच में उठाया।
सेविकाएँ चिल्लाईं। पहरेदार दौड़े।

कौआ धीरे-धीरे उड़ा — इतना धीरे कि पीछा हो सके — वापस बरगद के पेड़ की तरफ। साँप के बिल तक।
हार बिल में गिरा दिया।
पहरेदार आए। बिल में झाँका। सोने की चमक दिखी — और उसके पास लिपटा साँप।
वो डंडे और मशालें लेकर वापस आए।
साँप मारा गया। हार निकाला गया।
कौआ और कौई वापस घोंसले में आए।
उस साल अंडे दिए।
उस साल बच्चे निकले।
ताकत न हो तो दिमाग से काम लो।
साफ सोच वो कर सकती है जो ताकत कभी नहीं कर पाती।