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दो सिर वाला पक्षी

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दो सिर वाला पक्षी पंचतंत्र की एक अनोखी कहानी है — जो यह बताती है कि अपनों से लड़ने का नतीजा क्या होता है। दो हज़ार साल पुरानी यह कहानी आज भी उतनी ही सच्ची है।

एक जंगल में एक अजीब पक्षी रहता था।

दो सिर थे उसके। एक ही शरीर। एक ही पेट। एक जोड़ी पंख। पर दो सिर — दोनों की अपनी-अपनी आँखें, अपने-अपने विचार, अपनी-अपनी राय।

नदी किनारे रहते थे। पेड़ों के फल खाते थे। जब भी कोई एक सिर खाता — पेट दोनों का भरता था। पेट साझा था भले ही सिर नहीं थे।

काफी वक्त तक यह ठीक रहा।

एक सुबह पहले सिर को नदी किनारे एक अजीब फल मिला। मीठी खुशबू। पका हुआ। पहले कभी ऐसा नहीं देखा था।

उसने आराम से खाया। हर निवाला लाजवाब था।

दूसरा सिर देखता रहा।

"मुझे भी दो," दूसरे सिर ने कहा।

"मैंने ढूँढा," पहले सिर ने कहा। "मेरा है।"

"पेट तो एक ही है हमारा। तुम खाते हो तो मैं भी भरता हूँ। पर चखना भी चाहता हूँ।"

"नहीं," पहले सिर ने कहा। और आखिरी टुकड़ा खा लिया।

दूसरा सिर चुप रहा।

कुछ दिन बाद दूसरे सिर को पानी के पास कुछ मिला।

फल नहीं था। एक बेर था — काला, अनजाना। कुछ था उसमें जो ठीक नहीं लगता था। पर दूसरे सिर ने उसे उठा लिया।

Do sir wale pakshi ka pehla sir santusht aur ghamandi taraf mud ke baitha hai jabki doosra sir gusse se saamne rakhe chote kale ber ko dekh raha hai — khana chahta hai jaante hue bhi ki galat hai

"यह क्या है?" पहले सिर ने पूछा। "सही नहीं लग रहा।"

"मैंने ढूँढा," दूसरे सिर ने कहा। "मेरा है।"

"पेट एक है हमारा। तुम यह खाओगे तो दोनों को नुकसान होगा।"

"तुमने मेरे साथ नहीं बाँटा," दूसरे सिर ने कहा। "मैं क्यों बाँटूँ?"

उसने खा लिया।

पेट एक था। जो दूसरे सिर ने निगला — दोनों तक पहुँचा।

उस दोपहर दोनों नदी किनारे मर गए।

अपनों से लड़ने में अपना ही नुकसान होता है।
कोई जीतने वाला नहीं होता।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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