बंदर और कील पंचतंत्र की एक कहानी है — जो यह बताती है कि जो काम तुम्हारा नहीं उसमें दखल देना कितना महँगा पड़ सकता है। दो हज़ार साल पुरानी इस कहानी में एक बंदर की जिज्ञासा उसे बहुत भारी पड़ती है।
एक गाँव के किनारे एक बड़ा मंदिर बन रहा था।
मज़दूर सुबह आते और दोपहर के खाने के वक्त चले जाते। काम धीरे-धीरे होता था — लकड़ी तराशना, पत्थर जोड़ना, शहतीर लगाना। सब ध्यान का काम था।
एक दोपहर मुख्य बढ़ई एक बड़े लट्ठे पर काम कर रहा था। उसे लट्ठे को बीच से चीरना था। उसने एक लकड़ी की कील ठोककर दरार को खुला रखा — ताकि जब तक वो दूसरी तरफ से अपना सामान लेकर आए दरार बंद न हो जाए।
कील लगी थी। दरार खुली थी। बढ़ई चला गया।
पेड़ों पर बैठे बंदरों का झुंड सुबह से देख रहा था।
जब मज़दूर खाने के लिए गए तो बंदर नीचे उतरे। औज़ार छुए। पानी का घड़ा गिराया। रस्सियाँ खींचीं।
एक बंदर को लट्ठा मिला।
उस पर बैठ गया। कील को देखा। दरार को देखा।

दोनों हाथों से कील पकड़ी।
जंगल के पुराने बंदर जानते थे — चिरे हुए लट्ठे की कील कभी मत छुओ। पर यह बंदर नया था। जिज्ञासु था। किसी ने बताया नहीं था।
उसने कील खींच ली।
लट्ठे के दोनों हिस्से तेज़ी से बंद हो गए।
बंदर की टाँगें बीच में आ गईं।
मज़दूरों ने आवाज़ सुनी। दौड़कर आए। पर कुछ हो नहीं सकता था।
बंदर किसी को दोष नहीं दे सकता था। लट्ठे ने वही किया जो कील निकलने पर होता है। बंदर बस बीच में आ गया।
कुछ भी छूने से पहले — पूछो वो किस काम का है।
बंदर ने नहीं पूछा।
यही गलती थी।