मूर्ख बगुला और केकड़ा पंचतंत्र की एक कहानी है — जो यह बताती है कि किसी पर आँख मूँदकर भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है। दो हज़ार साल पुरानी इस कहानी में एक छोटे से केकड़े की समझदारी सबकी जान बचाती है।
एक जंगल के किनारे एक तालाब था।
उसमें मछलियाँ थीं, मेंढक थे, और भी कई जीव थे। और एक बगुला था — लंबा, सफेद, धैर्यवान। सालों से वहीं रहता था। रोज़ किनारे पर खड़ा होकर मछलियाँ पकड़ता था।
पर जैसे-जैसे बगुला बूढ़ा हुआ — धैर्य कम होने लगा। रोज़ घंटों खड़े रहना मुश्किल लगने लगा। उसने आसान तरीका सोचना शुरू किया।
एक सुबह वो किनारे पर उदास खड़ा था।
मछलियों ने देखा।
"क्या हुआ?" एक मछली ने पूछा।
"बहुत बुरी बात सुनी," बगुले ने कहा। "कल गाँव के पास गया था। लोग बात कर रहे थे। अगले महीने इस तालाब का पानी निकाल देंगे। तुम सब मर जाओगे।"
मछलियाँ डर गईं।
"अब क्या होगा?"
"एक और तालाब है," बगुले ने कहा। "गहरा। भरा हुआ। जंगल में और अंदर। मैं तुम्हें एक-एक करके वहाँ पहुँचा सकता हूँ। यही एक रास्ता है।"
मछलियों ने मान लिया।
एक-एक करके बगुला उन्हें चोंच में उठाकर जंगल की तरफ उड़ता।
दूसरे तालाब में नहीं गया।
जंगल में एक बड़े पत्थर के पास जाता। मछली रखता। खाता। वापस आता। अगली मछली।
यह कई दिन चलता रहा।
फिर केकड़े की बारी आई।
केकड़ा बगुले की पीठ पर बैठा। उड़े। पर केकड़ा देख रहा था। कोई तालाब नहीं दिखा। बस वही पत्थर — और उसके पास मछलियों की हड्डियों का ढेर।
केकड़ा समझ गया।
बगुले के उतारने से पहले ही उसने अपने पंजों से बगुले की गर्दन कस कर पकड़ ली।

बगुला छूटने की कोशिश करता रहा। नहीं छूट पाया।
"छोड़ दे," बगुले ने साँस लेते हुए कहा।
"पहले तालाब पर वापस चलो," केकड़े ने कहा।
बगुला वापस उड़ा।
केकड़ा पानी के किनारे उतरा। और बाकी सबको बताया जो उसने देखा था।
सब बच गए। बगुला फिर कभी नहीं आया।
कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता।
जो बिना माँगे बहुत कुछ देने लगे — पूछो क्यों।