एक गाँव में एक कुत्ता रहता था।
एक दिन उसे कसाई की दुकान के पास एक हड्डी मिली।
अच्छी हड्डी थी। बड़ी। ताज़ी। थोड़ा गोश्त भी लगा था। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। जल्दी से मुँह में दबाई और चल दिया। कहीं शांति से खानी थी।
घर का रास्ता एक नदी के पुल से जाता था।
पुल पर चढ़ा। बीच में पहुँचा।
तभी नीचे झाँका।
पानी में एक और कुत्ता था। मुँह में हड्डी दबाए। उसकी हड्डी से थोड़ी बड़ी लग रही थी।
कुत्ते ने ऊपर से देखा। उसने नीचे से देखा।
वो हड्डी चाहिए थी।
एक पल सोचा।
फिर मुँह खोला — उसकी हड्डी छीनने के लिए।

उसकी अपनी हड्डी पानी में गिरी। बड़ी छप की आवाज़ आई। डूब गई।
और पानी वाला कुत्ता — उसी पल गायब हो गया।
क्योंकि वो कभी था ही नहीं।
वो उसी का अक्स था। पानी में। और जो हड्डी पानी में दिख रही थी — वो उसी की हड्डी थी। ऊपर से देखने पर थोड़ी बड़ी लगती थी।
कुत्ता पुल पर खड़ा रहा।
नदी को देखता रहा। पानी बह रहा था। हड्डी बह गई थी।
काफी देर खड़ा रहा।
फिर खाली मुँह घर चला गया।
जो था वो असली था। जो पानी में दिखा वो नहीं था।
पर एक पल को लगा — दूसरे के पास ज़्यादा है।
लालच में जो है वो भी चला जाता है।