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कौआ और लोमड़ी

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कौआ और लोमड़ी पंचतंत्र की सबसे मशहूर कहानियों में से एक है — जो यह बताती है कि चापलूसी असल में तारीफ नहीं होती। दो हज़ार साल पुरानी यह कहानी आज भी उतनी ही तीखी है।

एक कौए को एक दिन नानबाई की दुकान के पास रोटी का एक टुकड़ा मिला।

अच्छा टुकड़ा था। ताज़ा। बड़ा। उसने जल्दी से चोंच में दबाया और उड़ गया। एक ऊँचे पेड़ की डाल पर बैठकर चैन से खाना था।

अभी बैठा ही था कि नीचे एक लोमड़ी आई।

लोमड़ी ने ऊपर देखा। रोटी देखी। चाहिए थी।

पेड़ पर चढ़ नहीं सकती थी। एक पल सोचा।

"क्या शानदार पक्षी है," लोमड़ी ने ज़ोर से कहा।

कौए ने नीचे देखा।

"मैं कई जंगलों में घूमी हूँ," लोमड़ी बोलती रही। "पर इतने सुंदर पंखों वाला कौआ कभी नहीं देखा। इतने काले। इतने चमकदार। इतने परफेक्ट।"

कौआ थोड़ा सीधा होकर बैठ गया।

"और वो पंख," लोमड़ी ने सिर हिलाते हुए कहा जैसे बहुत प्रभावित हो। "सुना है ऐसे पंखों वाले कौओं की आवाज़ भी सबसे मीठी होती है। क्या यह सच है?"

कौए को पहले कभी किसी ने शानदार नहीं कहा था। चमकदार नहीं कहा था। आवाज़ के बारे में तो किसी ने पूछा ही नहीं था।

उसने गाने के लिए चोंच खोली।

रोटी नीचे गिरी।

Ek kauwa unchi daal par baitha chonch khol ke gaana ga raha hai — aankhein thodi band — ghamand mein dooba — uski khuli chonch se roti neeche gir rahi hai aur lomdi neeche chalak muskan ke saath dekh rahi hai — panja taiyaar

लोमड़ी ने उठाई। बिना पीछे देखे चल दी।

"बहुत मीठी आवाज़ है," लोमड़ी ने कंधे के ऊपर से कहा। "शुक्रिया।"

कौआ डाल पर बैठा रहा।

भूख नहीं लगी थी अब। बस चुप था।

चापलूसी तारीफ नहीं होती।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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