पढ़ना सीखो

तीन मछलियाँ

2 मिनट

एक गाँव के किनारे एक बड़ा तालाब था।

उसमें तीन मछलियाँ रहती थीं। सारी उम्र वहीं। तालाब ठंडा था, गहरा था, खाना भरपूर था। हर कोना जानती थीं — उथला सिरा जहाँ नरकट उगते थे, बीच का अँधेरा हिस्सा जहाँ पानी सबसे ठंडा था, और वो पतली नहर जो पत्थरों के पीछे से एक नाले तक जाती थी।

तीनों में एक फर्क था।

पहली मछली हमेशा ध्यान देती थी। गर्मियों में पानी घटे तो नोट करती। मछुआरे किनारे आएँ तो जाल फेंकने से पहले हट जाती। जो दिखता था उस पर भरोसा करती थी।

दूसरी मछली समझदार थी पर देर से चलती थी। सोचती बहुत थी। फैसला करने से पहले इंतज़ार करती थी। देखती थी कि पहले क्या होता है।

तीसरी मछली को लगता था — जो होगा होगा। तालाब हमेशा ठीक रहा है। आगे भी रहेगा।

एक शाम पहली मछली किनारे के पास थी।

दो मछुआरे बात कर रहे थे।

"अच्छी जगह है," एक ने कहा। "कल सुबह जाल लेकर आते हैं। खूब मछलियाँ मिलेंगी।"

पहली मछली ने सुना। एक पल भी नहीं रुकी।

उसी रात पत्थरों के पीछे वाली नहर ढूँढी। पानी उथला था। रास्ता तंग था। पर सुबह होते-होते नाले में थी। सुरक्षित।

जाने से पहले दोनों को बताने की कोशिश की।

दूसरी ने कहा — सोचती हूँ।

तीसरी ने कहा — तालाब हमेशा ठीक रहा है।

अगली सुबह मछुआरे आए।

जाल फेंका।

An underwater view of a fisherman's net spreading through a pond with one space empty where a fish escaped one fish floating still on the surface playing dead and one fish tangled in the net looking genuinely surprised

दूसरी मछली ने जाल पानी में गिरते सुना। समझ गई। तुरंत पेट के बल उलटी हो गई। बिल्कुल सीधी। ऊपर तैरने लगी।

मछुआरे ने उठाया। "यह तो मरी हुई है।" किनारे फेंक दिया।

दूसरी मछली धीरे-धीरे नरकट में पहुँची। वहाँ से नहर तक।

तीसरी मछली जाल में फँसी।

सच में हैरान थी।

खतरा आ रहा हो तो उसके बारे में सोचना — उसे नज़रअंदाज़ करने से बेहतर है।
उस पर चलना — सोचने से बेहतर है।
और खतरा आने से पहले निकल जाना — इन सबसे बेहतर है।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

टिप्पणियाँ