बचपन डायरीज़
परिवार यादें
A simple Indian room with a desk showing a laptop open on a bank account screen a lit phone beside it and a handwritten notebook list with some items crossed out in warm afternoon light

पहली तनख्वाह

1 मिनट
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पहली तनख्वाह मंगलवार को आई।

रकम ज़्यादा नहीं थी। ऑफर लेटर में लिखा था — पर अकाउंट में असल में दिखना अलग बात थी। एक असली नंबर। अपना।

पहले माँ को फोन किया।

उन्होंने बधाई दी। पूछा — लंच किया। हाँ बोला। बोलीं — अच्छा है। नौ मिनट बेकार की बातें हुईं। फिर बोलीं — चूल्हे पर कुछ देखना है। फोन रख दिया।

कुछ देर बैठा रहा।

एक लिस्ट थी।

लिखी नहीं थी — महीनों से दिमाग में रखी थी। जब खुद के पैसे होंगे तब क्या करूँगा। कॉलेज के पास एक दुकान में एक जोड़ी जूते थे। दो बार देखे थे। नहीं खरीदे थे। एक किताब रुकी हुई थी। एक बार किसी ऐसी जगह खाना जहाँ कुर्सियाँ प्लास्टिक की न हों।

उस दिन इनमें से कुछ नहीं किया।

माँ के अकाउंट में दो हज़ार रुपये भेजे। कोई मैसेज नहीं — बस पैसे। बीस मिनट बाद उन्होंने फोन किया। बोलीं — ज़रूरत नहीं थी। बोला — पता है। उन्होंने धन्यवाद कहा। बोला — कोई बात नहीं।

फिर जूते खरीदने गया।

A young man sits on a low stool in a shoe shop in the evening looking down at a new pair of shoes on his feet with a quiet private smile while a shop assistant sits nearby paying no attention

पहले दो हफ्ते थोड़े काटते थे। फिर नहीं काटे।

ऑफिस पहने। किसी ने नोटिस नहीं किया। ठीक था। मैंने किया।

दूसरा काम जो किया — एक छोटा बचत खाता खोला। पाँच सौ रुपये डाले। बैलेंस छोटा था पर गंभीर लग रहा था।

पापा के बारे में सोचा। जो तीस साल से ऐसी ही कोई चीज़ में पैसे डालते थे। बिना किसी को असल रकम बताए।

पहली बार जब उन्होंने यह किया होगा — उस वक्त कैसा लगा होगा।

एक बात समझ में आई — अचानक, सीधे — जो पहले कभी नहीं समझी थी।

कुछ बातें माँ-बाप के बारे में तब समझ आती हैं —
जब वैसी ही कोई चीज़ हम खुद करते हैं।
पहली तनख्वाह उनमें से एक है।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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