रिज़ल्ट सुबह दस बजे आने वाला था।
कबीर को यह हफ्तों से पता था। एक कागज़ पर लिखकर मेज़ पर चिपकाया था। फिर उतार दिया — देखने से पेट में कुछ होता था। पर तारीख दिमाग में थी। कागज़ हो या न हो।
रात के ग्यारह बज रहे थे। वो नौ बजे से लेटा था।
छत देख रहा था।
फोन में क्लास ग्रुप के सत्रह मैसेज थे। खोले नहीं। पता था क्या होगा — सब एक-दूसरे को डरा रहे होंगे। या यह दिखाने की कोशिश कर रहे होंगे कि वो नहीं डरे। कबीर को वो नहीं चाहिए था।
दस बजे पापा ने कमरे में झाँका। गुड नाइट बोला। रिज़ल्ट का ज़िक्र नहीं किया।
कबीर समझ नहीं पाया — यह अच्छा था या बुरा।
साढ़े दस बजे माँ आईं। गर्म दूध लेकर।
बिस्तर के किनारे बैठ गईं। रिज़ल्ट का एक लफ्ज़ नहीं।
पड़ोसियों की शादी के बारे में बात की। नीला कुर्ता धुलवाना है क्या — पूछा। कुछ और बोलीं जो कबीर को याद नहीं रहा। फिर उठीं। दूध रखकर चली गईं।
कबीर ने दूध पिया।
कब नींद आई पता नहीं।
कोई सपना आया — क्रिकेट मैच था, बस का सफर था, कुछ और था। दिमाग ने रात की छुट्टी ले ली।
साढ़े सात बजे आँख खुली।
कमरे में सुबह की रोशनी थी। बाहर से चाय की खुशबू आ रही थी। किचन में कुछ तल रहा था।
कबीर लेटे-लेटे सोचता रहा।
ढाई घंटे बाद रिज़ल्ट है।
और — हैरानी हुई — ठीक लग रहा था। डर नहीं था। बस यह था कि होगा तो होगा। रात गुज़र गई। सुबह आ गई।
उठा। किचन में गया।

माँ पराठे बना रही थीं।
"बैठ," उन्होंने बिना मुड़े कहा।
वो बैठ गया।
रिज़ल्ट सवा दस बजे आया।
जो चाहा था वो सब नहीं मिला। कुछ मिला। एक विषय उम्मीद से बेहतर था। एक उम्मीद से कम।
माँ को फोन किया।
"कैसा रहा?"
नंबर बताए।
वो एक पल चुप रहीं। "आ जा। कुछ खा। दोपहर का खाना नहीं खाया।"
वो गया। खाया।
रिज़ल्ट वैसा ही रहा। वो ठीक रहा।
डर ज़्यादातर इंतज़ार में होता है।
जो चीज़ आती है — वो बस आती है।