हर साल मानसून आने से पहले मीरा अपनी खिड़की पर सात बोतलें रख देती थी।
सातों अलग-अलग आकार की। महीनों से किचन से बचाई हुई। माँ को अजीब लगता था। बड़े भाई को फिज़ूल।
पर मीरा ने यह नौ साल की उम्र से किया था — जब से नानी ने कहा था — "सावन की बारिश सिर्फ पानी नहीं होती। उसमें वो सब होता है जो आसमान साल भर रोककर रखता है।"
मीरा को ठीक-ठीक समझ नहीं आया था।
पर उसे यकीन था।
जिस साल मीरा पंद्रह साल की हुई — बारिश देर से आई।
जून जला। जुलाई आई तो बस ऐसे — जैसे मन न हो। दो-चार बूँदें जो आँगन की ज़मीन तक पहुँचने से पहले ही भाप बन गईं।
बोतलें खाली रहीं।
और मीरा को समझ नहीं आ रहा था कि खुद को कहाँ रखे।
एक परीक्षा थी जो डरा रही थी। एक दोस्ती थी जो चुपचाप खत्म हो रही थी — वो वाली दोस्ती जो लड़ाई से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कम होते मैसेज से खत्म होती है। घंटों वाली बातें अब तीन लाइन में सिमट गई थीं।
और यह भी नहीं पता था कि आगे क्या करना है ज़िंदगी में।
बारिश भी नहीं थी।
जुलाई के आखिरी हफ्ते की एक रात — रात के तीन बजे वो एक आवाज़ से जागी।
पहले गड़गड़ाहट। फिर मिट्टी की खुशबू। फिर छत पर ऐसी बारिश कि तकिये तक थरथरा उठा।
मीरा अँधेरे में दौड़ी।
खिड़की खोली — बारिश तिरछी आई, उसकी बाँह भीग गई। उसने एक-एक बोतल उठाई और बाहर निकाली। पानी भरता गया। बोतल का वज़न हाथ में बदलता रहा — खाली से भारी होता हुआ।

उसे पता नहीं क्यों — आँसू आ गए।
वो दुखी नहीं थी। या शायद थी भी — पर वो दुख नहीं था ठीक-ठीक। कुछ और था। कुछ खत्म होने और कुछ शुरू होने का एक साथ का अहसास।
जो शायद सबसे ज़्यादा इकट्ठा करने वाली चीज़ होती है।
सुबह सातों बोतलें भरी थीं।
मीरा ने उन्हें धुंधली रोशनी में खिड़की पर रखा और देर तक देखती रही।
पानी था। बस पानी। यह वो जानती थी।
पर यह भी सच था कि इंतज़ार बेकार नहीं गया था। जो चीज़ें हमारे हाथ में नहीं होतीं — वो भी अपने वक्त पर आती हैं।
उसने दोस्त को मैसेज किया। बस इतना — कल रात बारिश आई।
एक घंटे बाद जवाब आया — हाँ। मैंने सुनी। तुम्हारा ख़याल आया।
वो दोस्ती उस गर्मियों में खत्म नहीं हुई।