बचपन डायरीज़
यादें
An empty afternoon street with a wooden stick and coiled rope leaning against a wall, an old cardboard box and a damroo resting nearby, and a pair of slippers left behind in the dust

मदारी: वो तमाशा

4 मिनट
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दोपहर का वक़्त था, गली में सन्नाटा सा था, बस पंखे की आवाज़ और कहीं दूर रेडियो बज रहा था। तभी एक आवाज़ आई — डम... डम... डम... कोई डमरू बजा रहा था, दूर से, पर कान वहीं खड़े हो गए। खाना खाते खाते चम्मच वहीं छोड़ दी, चप्पल भी नहीं पहनी, बस दौड़ पड़े गली की तरफ।

पहुँचते ही सबने अपनी अपनी जगह पकड़ ली, जैसे यह भी कोई तय नियम हो। हम बच्चे सबसे आगे बैठ जाते, ज़मीन पर, धूल की परवाह किए बिना। बड़े लोग पीछे खड़े रहते, कोई दीवार से टेक लगाए, कोई हाथ बांधे। वो मदारी था। कंधे पर एक लंबी लकड़ी, उस पर बंधा एक बंदर, साथ में अक्सर एक बंदरिया भी।

भीड़ जुटते ही उसने डमरू और तेज़ बजाया, और बंदर ने हाथ जोड़कर सबको सलाम किया। रस्सी थोड़ी ढीली छोड़ते ही बंदर उछल के हमारी तरफ आ जाता, और अगली कतार में बैठे हम बच्चे फौरन पीछे को खिसक जाते, कोई तो चिल्ला भी पड़ता। मदारी मुस्कुराते हुए रस्सी खींच लेता — "डरो मत, काटता नहीं है" — पर अगली बार फिर वही होता।

पूरे खेल में मदारी बार बार रुक के कहता — "ताली बजाओ भाई लोग!" और चाहे ट्रिक अभी अधूरी ही क्यों ना हो, सब ताली बजाने लगते, जैसे यह भी खेल का ही हिस्सा हो।

फिर असली तमाशा शुरू होता। मदारी बंदर को "जमूरे" बुलाता, डमरू बजाते हुए गाता — "नाच मेरे जमूरे!" बंदर उछल के नाचने लगता, हाथ ऊपर उठा के, कभी एक पैर पे घूमता। बीच में मदारी अचानक रुक जाता, मुँह बना के पूछता — "क्यों रे, आज जमूरा नाराज़ हो गया क्या?" बंदर मुँह फुला के बैठ जाता, जैसे सच में रूठ गया हो। फिर मदारी मनाने के अंदाज़ में कहता — "चल आजा, कुर्सी पे बैठ जा।" वहीं पड़ा एक खाली डिब्बा उठा के बंदर उस पर ऐसे बैठ जाता जैसे सच में कोई कुर्सी हो, टांगें क्रॉस कर के, पूरी शान से।

इसके बाद मदारी की जुबान चलनी शुरू होती, एक के बाद एक किस्से। "अरे भाई लोगों, आज बाज़ार में पाँच सौ वाली घड़ी पचास में मिल गई! ज़रा दिखा जमूरे, कितनी खुशी हुई!" बंदर उछल उछल के कूदने लगता, जैसे लॉटरी लग गई हो। "अब दिखा, अक्षय कुमार वाला बैक जंप!" बंदर पीछे की तरफ पलटी मार के खड़ा हो जाता। "चल बता, सलमान खान एक्सरसाइज़ कैसे करता है?" बंदर सीना फुला के, हाथ ऐंठते हुए, ज़ोर ज़ोर से साँस लेने का नाटक करता, जैसे जिम में हो। हर बार कोई ना कोई नई फरमाइश आ जाती, और हम बस अगली ट्रिक का इंतज़ार करते रहते।

फिर मदारी अपने असली रंग में आता। "अरे घर में खुद खाना बना बना के थक गया है, जा अपनी बहू को ससुराल से वापस ले के आ, चल दिखा कैसे जाएगा।" बंदर लंगड़ाते हुए, मुँह लटकाए, जैसे किसी लंबी थकाऊ यात्रा पर निकल पड़ा हो। "अब ससुराल आ गया है, ये ले, कुर्सी नंबर दो पे बैठ जा" — मदारी वही डिब्बा आगे रखता, पर इस बार बंदर सिर हिला के मना कर देता। मदारी हैरान होने का नाटक करता — "क्यों रे, इस पर नहीं बैठेगा? दामाद वाली कुर्सी चाहिए?" फिर मुस्कुरा के कहता — "अरे ये कुर्सी तो तेरी साली साहिबा लेके आई है!" बंदर फौरन उछल के उस डिब्बे पर बैठ जाता, और पूरी गली तालियों से गूँज उठती।

Illustration of a man in red kurta sitting on straw ground at Indian village fair, holding bamboo pole and drum, trained monkey in pink outfit standing beside him with cattle in background

आखिरी में दुल्हन वाला खेल आता, सबसे ज़्यादा इंतज़ार वाला। "अब दिखाओ दुल्हन बनना।" बंदर ने सिर पर वो पुराना, मैला सा कपड़ा डाला, घूँघट जैसा, और शरमाते हुए इधर उधर देखने लगा। किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई — "अरे दहेज भी दो!" मदारी ने झट से कुछ ऐसा जवाब दिया कि सब खिलखिला उठे।

तमाशा खत्म होते ही मदारी ने थाली निकाली, बंदर के हाथ में पकड़ाई, और वो भीड़ के बीच घूम घूम के थाली आगे बढ़ाने लगा। कुछ लोग बालकनी से झाँक झाँक के देख रहे थे, नीचे सिक्का फेंक देते। ज़मीन पर बैठे हम बच्चे उठे बिना ही देखते रहते, जबकि कोई एक रुपये का सिक्का डालता, कोई दो का, कोई कोने से बिस्कुट भी दे देता।

आज सोचता हूँ तो लगता है कितना छोटा सा तमाशा था, फिर भी पूरी गली उमड़ पड़ती थी। ना मोबाइल था, ना यूट्यूब, बस एक डमरू की आवाज़ काफी थी सबको बाहर खींच लाने के लिए।

अब वो मदारी नहीं आते, बंदर नाच नहीं दिखाते। बाद में समझ आया, बंदर को यूं बांध के नचाना कानूनन मना था, जानवरों पर ज़्यादती मानी जाती थी ये। धीरे धीरे सरकार ने सख्ती शुरू की, और ये तमाशा भी बंद होता चला गया। सही ही हुआ शायद, अब सोचो तो। पर उस वक़्त हमें क्या पता था, बस इतना पता था कि अब मदारी नहीं आता।

जिन्हें फिर से वो दिन जीने हैं, या जिन्होंने कभी देखा ही नहीं, उनके लिए बस यूट्यूब पर कुछ पुरानी वीडियो बची हैं, गली की वो धूप और भीड़ की गर्मी वहाँ नहीं मिलती।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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