एक गाँव में एक व्यापारी रहता था।
उसके पास एक गधा था। रोज़ सुबह शहर से बाज़ार तक नमक ढोता था। रास्ता लंबा था। बीच में एक उथली नदी पड़ती थी।
गधे को नदी अच्छी तरह पता थी। कहाँ पत्थर हैं। कहाँ पानी गहरा है। कहाँ धारा तेज़ होती है। इतनी बार पार किया था कि आँखें बंद करके भी कर सकता था।
एक सुबह नदी पार करते हुए गधा फिसला।
पानी में बैठ गया। व्यापारी ने खींचकर उठाया। जब खड़ा हुआ तो बोझ हल्का था। पीठ पर से नमक पानी में घुल गया था।
गधे ने यह बात ध्यान से नोट की।
अगली सुबह फिर वही हुआ। वही जगह। वही तरकीब। व्यापारी झल्लाया पर बोला कुछ नहीं। सोचा — दुर्घटना होती है।
तीसरी सुबह भी यही।
अब व्यापारी किनारे खड़ा रहा। गधे को नदी में मज़े से बैठे देखता रहा। समझ गया क्या हो रहा है।
अगले दिन उसने नमक नहीं लादा।

बाज़ार से रुई के दो बड़े गट्ठर लाया। लादे गधे पर। इतने हल्के थे कि लगा जैसे कुछ है ही नहीं।
गधा खुश था। चलते-चलते नदी पर आया। अपनी जगह ढूँढी। और आराम से बैठ गया।
पानी ने रुई में घुसना शुरू किया।
गधे को पहले कुछ नहीं लगा। फिर थोड़ा भारीपन महसूस हुआ। फिर और। जब उठने की कोशिश की तो पाँव काँपे। किसी तरह किनारे आया। भीगा खड़ा रहा। पाँव थरथरा रहे थे।
व्यापारी ने एक शब्द नहीं कहा।
उस दिन के बाद गधे ने नदी में कभी नहीं बैठा।
चालाकी एक बार काम आती है।
दूसरी बार सामने वाला तैयार होता है।