एक छोटे से शहर में तेनालीराम रहते थे।
घर छोटा था। आँगन था। एक कुआँ था। और थोड़ी-सी जमापूँजी थी जो उन्होंने सालों में जोड़ी थी।
एक शाम पड़ोसी दौड़ता हुआ आया। साँस फूली हुई थी।
"तेनालीराम जी," उसने कहा, "सुना है चोरों का एक गिरोह इस तरफ आ रहा है। पिछले तीन मोहल्लों में घर खाली कर चुके हैं। रात तक इस गली तक पहुँचेंगे।"
तेनालीराम ने धन्यवाद कहा। अंदर आ गए।
पत्नी घबराई हुई थी। "कुछ तो करना होगा। पैसे कहीं छुपाने चाहिए — ऐसी जगह जहाँ चोर न ढूँढ सकें।"
"हाँ," तेनालीराम बोले।
उठे। जमापूँजी का छोटा सा संदूक उठाया। आँगन में आए। कुएँ के पास गए।
और संदूक कुएँ में डाल दिया।
छप की आवाज़ आई।
पत्नी दौड़कर आई। "यह क्या किया? सारी जमापूँजी कुएँ में फेंक दी?"
"हाँ," तेनालीराम बोले। "अब सोते हैं।"
और सो गए।
रात को चोर आए।
दरवाज़ा खोला। अंदर घुसे। घर का कोना-कोना छाना। हर दराज़ खोली। हर बर्तन उठाया। हर चटाई उलटी। कुछ नहीं मिला।
तब उनकी नज़र आँगन के कुएँ पर पड़ी।
आपस में बात की। ज़रूर इसी में छुपाया होगा। रात भर काम लगा। बाल्टी-बाल्टी पानी निकाला। आँगन में डालते रहे। एक बाल्टी। दो बाल्टी। दस बाल्टी। बीस बाल्टी।

आँगन में पानी भर गया।
धीरे-धीरे कुआँ खाली होने लगा।
पर आसमान भी हल्का होने लगा।
सुबह होने वाली थी। लोग जागेंगे। आवाज़ें आएँगी। चोर रुक नहीं सकते थे।
खाली हाथ भागे।
तेनालीराम सुबह उठे।
आँगन में पानी भरा था। कुआँ खाली था। आराम से रस्सी डाली। संदूक निकाला। नाश्ता किया।
सब्ज़ियों का बगीचा रात भर के पानी से अच्छे से सिंचा था।
पत्नी ने देखा और कहा — "आपको पहले से पता था कि वो कुआँ खाली करने की कोशिश करेंगे।"
तेनालीराम ने एक पल सोचा। "सोचा था शायद।"
"तो रात को बताया क्यों नहीं?"
"बताता तो नींद कैसे आती?" उन्होंने कहा।
समझदारी वो है जो लड़े बिना जिताए।