राजा कृष्णदेवराय के महल में उन दिनों चूहों ने जीना मुश्किल कर रखा था।
रसोई में चूहे। अनाज के कमरे में चूहे। एक बार तो राजा की पगड़ी में भी कुछ हिला था — पर उस बारे में दरबार में कोई बात नहीं हुई।
आख़िरकार राजा ने कहा — "जो इस परेशानी का हल निकालेगा, उसे इनाम मिलेगा।"
पीछे सौ बिल्लियाँ थीं — एक से एक। गोल आँखें, सीधी पूँछें, और चलने का ऐसा ढंग जैसे महल पहले से उनका हो।
"महाराज," व्यापारी ने कहा, "सौ सोने के सिक्के दीजिए। हफ्ते भर में एक चूहा नहीं बचेगा।"
राजा मान गए। एक शर्त थी — हर बिल्ली को रोज़ दो बार शाही रसोई का दूध।
व्यापारी खुशी-खुशी चला गया।
हफ्ता बीता।
बिल्लियाँ मस्त थीं। दूध पी रही थीं, धूप में बैठ रही थीं, और कभी-कभी बड़ी गंभीरता से किसी दीवार को घूरती थीं — पर चूहे पकड़ने की नौबत आने से पहले ही जम्हाई लेकर सो जाती थीं।
चूहे कम ज़रूर हुए थे। पर गए नहीं थे।
तेनालीराम यह सब देखते रहे। कुछ बोले नहीं।
एक शाम राजा के पास गए।
"महाराज।"
"हाँ?"
"तीन दिन।"
राजा ने उनकी तरफ देखा। तेनालीराम के चेहरे पर वो मुस्कान थी जो आमतौर पर तब आती थी जब उनके मन में कुछ पक चुका हो।
"ठीक है," राजा ने कहा।
तेनालीराम सीधे रसोई गए।
रसोइये से धीरे से कहा — "बिल्लियों का दूध बंद।"
रसोइया घबराया — "पर महाराज ने कहा था—"
"मैंने कहा।"
पहले दिन बिल्लियाँ इधर-उधर घूमती रहीं।
दूसरे दिन उनकी आँखें थोड़ी तेज़ हो गईं।
तीसरे दिन — महल में एक अजीब सी हलचल थी। बिल्लियाँ दौड़ रही थीं। कोनों में झाँक रही थीं। अलमारियों के पीछे घुस रही थीं।
शाम तक महल में एक भी चूहा नहीं था।

राजा हैरान थे।
"यह कैसे हुआ?"
तेनालीराम ने दरबार में एक नज़र घुमाई। धीरे से बोले —
"महाराज — जिसे बिना मेहनत के सब कुछ मिल रहा हो, वो मेहनत क्यों करेगा। यह बात सिर्फ बिल्लियों की नहीं है।"
दरबार में कुछ लोग हँसे। कुछ ने नज़रें झुका लीं।
राजा काफी देर तक हँसते रहे।
उस दिन के बाद से नियम बन गया।
पहले काम — फिर दूध।
बिल्लियों ने कभी आपत्ति नहीं की।