पढ़ना सीखो

कौआ और घड़ा

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A black crow stands beside a tall clay pitcher in a dry dusty village garden, pebbles scattered on the cracked earth around him

बहुत दिनों से बारिश नहीं हुई थी।

जंगल सूखा था। धूल भरा था। तालाब सिकुड़ गए थे। नदियाँ पतली हो गई थीं। जानवर प्यासे थे।

एक कौआ सुबह से उड़ रहा था। सूखे खेतों के ऊपर। फटी ज़मीन के ऊपर। घरों के बाहर रखे खाली मटकों के ऊपर।

कहीं पानी नहीं।

तब — गाँव के किनारे एक बगीचे में — उसे एक घड़ा दिखा।

वो उसके पास उतरा। अंदर झाँका। नीचे पानी था। ज़्यादा नहीं। बस इतना। पर घड़ा लंबा और पतला था — कौए ने जितना भी गर्दन लंबी की, चोंच तक नहीं पहुँची।

घड़ा झुकाने की कोशिश की। बहुत भारी था।

तोड़ने की कोशिश की। बहुत सख्त था।

वो वहीं बैठ गया। घड़े को देखता रहा। काफी देर तक।

फिर उसने ज़मीन को देखा। चारों तरफ छोटे-छोटे गोल कंकड़ बिखरे थे।

उसने एक कंकड़ चोंच में उठाया। घड़े में डाला।

पानी थोड़ा सा ऊपर आया।

एक और डाला। फिर एक और। फिर एक और। वो लगातार काम करता रहा — एक-एक कंकड़। बिना जल्दी किए। बिना रुके। पानी धीरे-धीरे ऊपर आता रहा।

धीरे। धीरे। धीरे।

और फिर किनारे तक आ गया।

कौए ने पेट भर पानी पिया। फिर दोपहर की छाँव में बैठ गया।

कभी-कभी ताकत से नहीं होता। जल्दी से भी नहीं।

कभी-कभी बस एक-एक छोटा काम करते रहने से होता है। 

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