एक जंगल था।
उस जंगल में एक शेर रहता था। बड़ा। ताकतवर। सब उससे डरते थे।
एक दोपहर वो एक पुराने पेड़ के नीचे सो रहा था। हवा चल रही थी। जंगल शांत था।
तभी एक चूहा उसके पंजे पर से दौड़ गया।
शेर की आँख खुली। गुस्से में हाथ उठाया। एक झटके में चूहे को पकड़ लिया। हथेली पर रखकर देखा।
बहुत छोटा था। इतना छोटा कि खाने के काम का भी नहीं था।
"छोड़ दो," चूहे ने कहा। साँस फूल रही थी पर आवाज़ में डर नहीं था। "मैं इतना छोटा हूँ कि किसी काम का नहीं। पर एक दिन शायद आपके काम आऊँ।"
शेर ने चूहे को देखा। फिर हँसा। ज़ोर से। यह विचार ही मज़ेदार था — यह नन्हा जीव उसके काम आएगा।
रख दिया उसे। वापस सो गया।
चूहा भागा। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
कुछ हफ्ते बाद शेर जंगल के दूसरी तरफ जा रहा था।
वहाँ शिकारियों ने जाल बिछाया था। तीन पेड़ों के बीच फैला था। रंग पत्तियों जैसा था। दिखता नहीं था।
जब तक शेर को महसूस हुआ — फँस चुका था।
जितना खींचा उतना कसा। जितना उछला उतना उलझा। रस्सियाँ मोटी थीं। दाँत और पंजे काम नहीं आए।
दहाड़ता रहा। देर तक।
पूरा जंगल सुन रहा था।
चूहे ने भी सुना।

पहचानी आवाज़ थी। दौड़ा। जाल तक पहुँचा। मोटी रस्सियाँ उसके बस की नहीं थीं — पर वो पतले धागे जो सब कुछ थामे थे — उन्हें एक-एक करके काटने लगा।
एक धागा। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
जाल ढीला पड़ा। फिर और ढीला। फिर खुल गया।
शेर बाहर आया। खड़ा हुआ। साँस ली।
चूहे को देखा।
चूहे ने देखा।
दोनों चुप रहे। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी।
कोई जीव इतना छोटा नहीं कि काम न आए। और बिना सोचे की गई भलाई — वापस आती है।