यादें

पापा का रेडियो

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My Father's Radio

पापा का रेडियो एक फिलिप्स ट्रांजिस्टर था।

गहरे भूरे रंग का। गोल डायल। और एक नारंगी सुई जो घुमाने पर हिलती थी। वो स्टडी में मेज़ के ऊपर वाली शेल्फ पर रखा रहता था — पार्कर की स्याही की बोतल के पास। और एक छोटे से पीतल के गणेश जी के पास, जो पापा को उनके अपने पिता ने दिए थे।

हर सुबह छह बजे वो उसे चालू करते थे।

पहले खड़खड़ाहट। फिर विविध भारती की आवाज़ — कभी साफ, कभी बीच में गुम होती हुई। फिर उद्घोषक की आवाज़ — धीमी, गर्म। उस ज़माने के रेडियो वालों जैसी। हिंदी में खबरें पढ़ते थे — इस तरह कि साधारण बातें भी ज़रूरी लगती थीं।

मुझे बचपन में लगता था — सुबह ऐसी ही होती है।

पापा ने कभी नहीं बताया कि उन्हें रेडियो से इतना लगाव क्यों था।

जैसे उन्होंने कभी नहीं बताया कि अखबार क्यों पढ़ते थे, कड़क चाय क्यों पीते थे, और उस एक खास बिस्किट को चाय में डुबोकर ठीक दो बार क्यों गिनते थे। यह सब उनका अपना था। बिना शोर के। बिना किसी को बताए।

यही उनका तरीका था।

एक बार कॉलेज से गर्मियों में घर आया तो देखा — रेडियो बंद पड़ा था।

सुई अटकी हुई थी। पापा उसे मेज़ पर खोलकर रखे थे। पीछे का पैनल हटा हुआ था। छोटे-छोटे पुर्जे अखबार पर सजे थे।

"बाज़ार में एक आदमी मिला जो ठीक करता है इन्हें," उन्होंने बिना ऊपर देखे कहा। "कह रहा था पुर्जा मिल जाए तो हो जाएगा। उसने यह मॉडल पहले देखा है।"

मैंने कुछ नहीं कहा। पर सोच रहा था — नया रेडियो तो इससे सस्ता पड़ेगा।

पापा को भी पता था।

पर वो उसे इसलिए नहीं ठीक करवा रहे थे कि यही समझदारी थी। वो उसे ठीक करवा रहे थे क्योंकि वो उनका रेडियो था। और यह फर्क — उस वक्त मुझे समझ आने लगा था।

बाज़ार वाले ने ठीक कर दिया।

रेडियो अगले बारह साल उसी शेल्फ पर रहा। दो बार घर बदला। एक नाती आया। पापा रिटायर हुए। एक दिल की तकलीफ हुई जिसके बारे में घर में कोई सीधे बात नहीं करता था।

फिर फरवरी में — एक ठंडी सुबह जिसमें लकड़ी जलने की खुशबू थी — पापा नहीं रहे।

 रेडियो उसी शेल्फ पर था। 

An elderly Indian man sits at his desk in the early morning, hand resting on his Philips transistor radio

अब वो मेरे पास है।

मुझे नहीं पता मैंने रखा क्यों। मैंने कभी विविध भारती नहीं सुनी। उन लंबी सुबह की खबरों में मेरा मन नहीं लगता था।

पर पिछले साल उसे फिर से ठीक करवाया। इंटरनेट पर एक आदमी मिला जो पुराने ट्रांजिस्टर जानता है। अब वो मेरी शेल्फ पर रखा है — पापा की एक तस्वीर के पास। और उन्हीं पीतल के गणेश जी के पास।

कभी-कभी सुबह चालू करता हूँ।

सिग्नल आता-जाता है। कभी कोई धुन। कभी बस खड़खड़ाहट।

पर मैं सुनता रहता हूँ।

अभी सीख रहा हूँ कि विरासत में मिलना क्या होता है — चीज़ का नहीं, उस तरीके का जिससे पापा उसे सुनते थे। पूरी तरह। बिना जल्दी के। जैसे आवाज़ मायने रखती हो।

मैं कोशिश कर रहा हूँ।

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