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नीला सियार

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एक जंगल था।

उस जंगल के किनारे एक धोबी की दुकान थी। बड़े-बड़े कुंड रखे थे वहाँ — लाल, पीला, हरा, नीला। कपड़े रंगे जाते थे उनमें।

एक रात एक सियार कुत्तों से भागा।

अँधेरा था। रास्ता नहीं दिखता था। भागते-भागते धोबी की दुकान के पास पहुँचा। पाँव फिसला। और एक नीले रंग के कुंड में जा गिरा।

बाहर निकला तो पूरा नीला था। सिर से पूँछ तक।

नदी किनारे गया। पानी में अपना अक्स देखा। बहुत देर देखता रहा।

एक काम की बात थी इसमें।

फिर जंगल में वापस चल दिया।

जानवरों ने ऐसा रंग कभी नहीं देखा था।

न आसमान जैसा नीला, न पानी जैसा — पक्का, गहरा, अजीब। एक बंदर देखकर पेड़ पर चढ़ गया। हिरन भागे। शेर ने भी दूरी बनाए रखी।

सियार समझ गया। यह रंग काम आएगा।

उसने सबको बुलाया। एक बड़े पत्थर पर खड़ा हो गया। आवाज़ गंभीर की।

"मुझे भगवान ने भेजा है," उसने कहा। "मेरा नाम है काकुद्रुम। यह जंगल अब मेरे अधीन है।"

किसी ने नहीं पूछा — सच है या नहीं। ऐसा रंग पहले कभी नहीं देखा था। ज़रूर कुछ खास होगा।

A bright blue jackal stands confidently on a large rock in a jungle clearing while a lion tiger elephant and other animals look up at him with wide impressed eyes

शेर उसका अंगरक्षक बन गया। बाघ मंत्री। हाथी रास्ता साफ करता। सबसे पहले काम जो किया — बाकी सियारों को जंगल के किनारे भेज दिया। वो उसे पहचान सकते थे।

हफ्तों यही चलता रहा।

काकुद्रुम मज़े से रहता। शेर उसकी रखवाली करता। बाघ उसकी बात मानता। जंगल में उसकी चलती थी।

फिर एक रात दूर से सियारों की आवाज़ें आईं।

वो खास आवाज़ जो सियार हर शाम निकालते हैं। लंबी। उठती-गिरती।

काकुद्रुम सुन रहा था।

और फिर — बिना सोचे, बिना तय किए — उसका गला खुल गया।

जो आवाज़ निकली वो सियार की थी। एकदम पक्की। कोई शक नहीं।

शेर ने सुनी। बाघ ने सुनी। पूरे जंगल ने सुनी।

सबने उस नीले जीव को देखा। फिर एक-दूसरे को देखा।

काकुद्रुम पत्थर से उतरा। भागा।

तेज़ था — पर शेर से तेज़ नहीं था। जंगल अँधेरा था। और जिन्हें उसने दूर भेजा था — वो मदद करने नहीं आएँगे।

जो हम हैं वो छुपता नहीं।
देर से सही — निकल ही आता है।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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