पढ़ना सीखो

कछुआ और खरगोश

2 मिनट
Read in English →

एक जंगल था।

उस जंगल में एक खरगोश था जो बहुत तेज़ दौड़ता था।

इतना तेज़ कि जब वो निकलता तो रास्ते की धूल भी पीछे रह जाती। पेड़ों के बीच से गुज़रता तो पत्ते हिल जाते। नदी किनारे पानी पीने जाता तो दूसरे जानवर रास्ता दे देते।

यह बात सब जानते थे। खरगोश खुद भी जानता था। और जब भी मौका मिलता — बता देता था।

एक दोपहर वो जंगल के रास्ते से जा रहा था। तभी उसने एक कछुए को देखा। धीरे-धीरे चल रहा था। एक-एक कदम उठाता। रुकता नहीं था पर तेज़ भी नहीं था। बस अपनी चाल से।

"अरे भाई," खरगोश बोला। "इस रफ्तार से तो नदी तक पहुँचते-पहुँचते महीना निकल जाएगा।"

कछुए ने ऊपर देखा। खरगोश को देखा। फिर बोला — "दौड़ लगाओगे? कल सुबह। उस पुराने बरगद से नदी तक।"

खरगोश एक पल चुप रहा। सोचा — यह मज़ाक तो नहीं? पर कछुआ बिल्कुल सीरियस था। न मुस्कुरा रहा था, न शरमा रहा था।

"ठीक है," खरगोश बोला। और हँसते हुए चला गया।

बात जंगल में फैल गई। अगली सुबह देखने वालों की भीड़ लग गई। हिरन पेड़ों के पास खड़े थे। बंदर डालियों पर बैठे थे। चिड़ियाँ झुंड में आई थीं। गिलहरियाँ इधर-उधर भाग रही थीं। कोई नहीं मानता था कि कछुआ जीत सकता है। पर तमाशा देखने सब आए।

दोनों बरगद के पास आए।

दौड़ शुरू हुई।

खरगोश निकला — इतनी तेज़ी से कि धूल उड़ गई। पलक झपकते कछुआ नज़र से ओझल हो गया। खरगोश आगे था। बहुत आगे।

रास्ते में एक आम का पेड़ था। पुराना। घनी छाँव। खरगोश रुका। इधर-उधर देखा। कछुए का कहीं पता नहीं था।

लेट गया।

सोचा — कछुए को आने में घंटों लगेंगे। अभी तो शुरुआत भी मुश्किल से की होगी। थोड़ा आराम कर लेते हैं।

हवा चल रही थी। छाँव ठंडी थी।

आँख लग गई।

कछुआ चलता रहा।

न तेज़, न धीमा। बस अपनी चाल। जैसे सुबह चला था वैसे ही। एक पत्थर आया तो उसके पास से गुज़रा। एक गड्ढा आया तो किनारे से गया। आम का पेड़ आया — छाँव में सोते हुए खरगोश को देखा। एक पल रुका नहीं। आगे चल दिया।

जब खरगोश की आँख खुली तो धूप बदल चुकी थी।

घबरा गया। उठा। पीछे देखा — कछुआ कहीं नहीं था। सामने देखा — कछुआ कहीं नहीं था।

वो दौड़ा। जितना हो सके उतना तेज़। आम का पेड़ पीछे छूटा। मैदान पीछे छूटा। जंगल का मोड़ आया। उसके बाद नदी दिखती थी।

मोड़ पार किया।

कछुआ नदी के किनारे बैठा था। शांति से पानी देख रहा था। जैसे बहुत देर से वहाँ हो।

A calm tortoise sits at a riverbank looking at the water while a hare runs hard toward the finish far in the background on a warm forest afternoon

चिड़ियाँ ज़ोर से चहचहाने लगीं। बंदरों ने शोर मचाया। हिरनों ने एक-दूसरे को देखा।

खरगोश वहीं खड़ा रह गया।

तेज़ था खरगोश। यह सच था।
पर कछुआ रुका नहीं — और खरगोश रुक गया।
बस यही फर्क था।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

टिप्पणियाँ