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An electric tester lying on workbench

जो पीछे रह गया

पापा के हाथ याद हैं मुझे, खुरदुरे, कहीं कहीं कटे हुए, जलने के हल्के निशान। फैक्ट्री में सुपरवाइज़र थे, दिल्ली में, प्लास्टिक के डिब्बे बनते थे वहाँ, नाइट शिफ्ट ज़्यादा। दो साल हम उसी फैक्ट्री के अंदर रहे, जब मैं दस का था। गरम प्लास्टिक हाथ से उठा लेते थे कभी कभी, बिना सोचे, जैसे हाथों को पहले से पता हो कि कुछ नहीं होगा।

फैक्ट्री के बाद एक कमरा किराए पर लिया, दस बाई दस, घर कहने लायक भी नहीं था। एक सुबह नाइट शिफ्ट से लौट रहे थे साइकिल पर, मुझे कंचे खेलते देखा गली में। पीछे से एक हाथ सिर पर, साइकिल रुकी भी नहीं। बस इतना ही। कभी दोबारा नहीं मारा, और वो भी गुस्से वाला नहीं था, अब सोचता हूँ तो यही याद सबसे ज़्यादा साफ है।

मम्मी बताती हैं, इससे भी पहले, जब मैं और छोटा था, याद भी नहीं मुझे उतना, एक बार मारा था उन्होंने, बुखार तक आ गया था। मुझे खुद याद नहीं वो। जो याद है, मम्मी पर कभी हाथ नहीं उठाया उन्होंने। मम्मी कहती हैं, दसवीं ही पास थे, पर उससे ज़्यादा समझदार थे, मतलब गुस्से की जगह चुप रहना चुन लेते थे हमेशा।

चार भाई थे वो, तीसरे नंबर पर थे। सबसे बड़े वाले को भी देखा है मैंने बड़े होते हुए, हाथ नहीं उठाते थे पर गाली गलौज बहुत करते थे। पापा अलग थे अपने ही भाई से, इस मामले में।

फोन का शौक था उन्हें। सबसे सस्ता नहीं लेते थे, सबसे महंगा भी नहीं, बस जितनी हैसियत थी उसमें सबसे अच्छा। ईयरफोन भी हमेशा चलता हुआ रखते, घर में और भले कुछ पुराना ही क्यों न हो।

मम्मी बताती थीं, फिल्मों के शौकीन थे पहले, हर नई रिलीज़ देखनी होती थी उन्हें। मैंने कभी नहीं देखा वो वाला रूप। एक बार भी याद नहीं कि फिल्म देखने गए हों। शायद ज़िम्मेदारियों में छूट गया वो सब।

घर में कुछ भी खराब हो, पापा ठीक कर देते थे। टीवी, डीवीडी प्लेयर, स्विच बोर्ड, गीज़र, पंखा, कूलर, सब। दुकान वाली नौबत तभी आती जब चीज़ सच में बहुत ज़्यादा खराब हो। शर्ट की बाईं जेब में एक टेस्टर रहता हमेशा, भूलते नहीं थे कभी। खाना भी अच्छा बनाते, छुट्टी वाले दिन कुछ अलग सा, पनीर या चिकन। बस एक तारीफ चाहिए होती बनाने के बाद, न मिले तो खुद ही कह देते, देखा, सही बना है ना।

शनिवार छुट्टी होती उनकी। सब साथ जाते मंडी, शनि बाज़ार, जलेबी खाते, कपड़े लेते, कभी कोई खिलौना भी। हफ्ते भर मम्मी पापा के बीच जो थोड़ी बहुत खटपट रहती, ज़रूरी बात के अलावा कुछ नहीं, वो सब उस दिन अपने आप ठीक हो जाता। किसी ने सॉरी नहीं बोला कभी, बस सब सामान्य हो जाता वापस।

दसवीं में फोन माँगा था एक बार। सैमसंग का कीपैड वाला दिलाया, ढाई हज़ार का, तनख्वाह थी चौदह हज़ार के आसपास। महीने भर में स्कूल में कहीं खो दिया मैंने। कुछ नहीं बोले पापा। न गुस्सा, न कोई बात। लगा मुझे कि अंदर से बहुत गुस्सा होंगे, उस उम्र में समझ नहीं थी ढाई और चौदह हज़ार का हिसाब, बस इतना पता था कि कितनी मेहनत लगती है वो पैसा कमाने में।

कॉलेज गया तो कुछ बदल गया अंदर ही अंदर। गुस्सा नहीं रहा, बस दूरी सी आ गई, ठंडापन। शायद यही समझ आई हो उन्हें, कि अब बड़ा हो गया बेटा, हाथ उठा दिया कभी तो शायद खुद को माफ न कर पाएँ।

आज इतना कमा लेता हूँ कि पैसे की कोई कमी नहीं रहती अब। सोचता हूँ अक्सर, मिल जाएँ कहीं तो पूछूँ, बताइए कौन सा फोन चाहिए अभी, कौन से एक्सेसरीज़, मैं ला दूँगा। जो दिया उन्होंने वो कीमत से बाहर की चीज़ थी, आज सामने भी आ जाएँ तो चुका नहीं सकता वो मेहनत, वो चुप्पी, जिसमें से कुछ शायद मेरी वजह से भी रही हो।

जिस दिन वो गए, दोस्त के साथ था मैं, कोई बात चल रही थी, फोन उठाने ही वाला था उन्हें बताने, तभी याद आया, हैं ही नहीं अब। बाइक अभी भी रखी है उनकी। बेचने की सोचता हूँ कभी कभी, पर सोचते ही सीना भारी हो जाता है, गला सूखने लगता है।

उनकी पुरानी तस्वीरें भी हैं मेरे पास। दोस्तों के साथ, मम्मी के साथ मेरे होने से पहले की, मेरे साथ, बहन के साथ। कुछ में तो मैं हूँ ही नहीं।

दो बेटे हैं मेरे, एक साढ़े चार साल का, एक दो साल का। दोनों को मम्मी ज़्यादा पसंद है अभी, प्यार मुझसे भी करते हैं, पर मम्मी के बाद। पता है छोटे हैं अभी, फिर भी एक एहसास रहता है जो पूरा बता नहीं पाता।

पापा बूढ़े हो जाते हैं एक दिन। कमाना बंद हो जाए फिर भी, घर की नींव वही रहते हैं, घर का मान वही होते हैं। बेटा निकल पाता है घर से बेफिक्र, क्योंकि पापा हैं घर पर, सब संभल जाएगा उनसे। मेरे लिए वो बात अब नहीं रही।

कभी मेरा बेटा पूछे, पापा आपको क्या गिफ्ट चाहिए, तो बस इतना कहूँगा, प्यार कर लो अगर कर सको, जाने से पहले।

मिस यू, पापा।

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