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बीरबल और धोबी

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अकबर के राज में एक धोबी था।

उसके पास एक गधा था। बूढ़ा। धीमा। खूब खाने वाला। धोबी उसकी शिकायत हर किसी से करता — बीवी से, पड़ोसियों से, जो भी सुनने को तैयार हो। गधा बेकार है। बोझ है। बस खाता-सोता है। इतने साल हो गए पर काम का नहीं हुआ।

एक दिन बादशाह अकबर दरबार के बाहर से गुज़र रहे थे। धोबी की बातें सुनाई दीं।

"अगर गधा इतना बेकार है," उन्होंने बीरबल से कहा, "तो धोबी रखता क्यों है?"

बीरबल ने कहा — जहाँपनाह, पता करता हूँ।

बीरबल धोबी के घर गए। खामोशी से एक तरफ बैठ गए। पूरी दोपहर वहाँ रहे। कुछ नहीं बोले। बस देखते रहे।

देखा — सुबह से गधा नदी के चक्कर लगा रहा है। गीले कपड़ों के भारी बोझ उठाता है। धूप में खड़ा रहता है। धोबी उसे बिना एक शब्द कहे लादता है। जब थोड़ी देर मिलती है तो धोबी छाँव में बैठता है। गधा धूप में खड़ा रहता है।

शाम को बीरबल दरबार लौटे।

"गधा बेकार नहीं है," उन्होंने कहा। "ज़्यादातर काम वही करता है। धोबी शिकायत इसलिए करता है क्योंकि शिकायत में कुछ नहीं लगता — और आभार मानना मुश्किल होता है।"

अकबर ने सोचा। "तो क्या किया जाए?"

"कुछ नहीं," बीरबल बोले। "गधे को पता नहीं कि उसकी शिकायत हो रही है। वो बस काम करता रहता है।"

अकबर पहले हँसे। फिर रुक गए।

Emperor Akbar sits on his throne with a laugh that has just stopped and a realisation crossing his face while Birbal stands beside him with a calm knowing smile saying nothing

बीरबल को देखा।

"तुम गधे की बात कर रहे हो?" उन्होंने धीरे से पूछा।

बीरबल चुप रहे।

पर मुस्कुराए।

घर में, दफ्तर में, हर जगह ऐसे लोग होते हैं जो चुपचाप काम करते हैं।

उन्हें कोई नहीं देखता।

धन्यवाद कहना मुश्किल नहीं।
बस आदत नहीं होती।

Manoj Rajput

Manoj Rajput

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