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बंदर और मगरमच्छ

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A monkey sitting on a crocodile swimming on river, the crocodile is sad and monkey is afraid of the situation

एक चौड़ी, शांत नदी के किनारे एक जामुन का पेड़ था।

उसकी डालियाँ पानी के ऊपर तक फैली हुई थीं — और गर्मियों भर उससे लाल-लाल मीठे जामुन टपकते रहते थे। उस पेड़ पर एक बंदर रहता था। हँसमुख, फुर्तीला, और जामुन का बड़ा शौकीन।

एक दिन नदी की गहराई से एक मगरमच्छ ऊपर आया। दुबला-पतला, थका हुआ।

बंदर का दिल पसीज गया। उसने एक मुट्ठी जामुन पानी में फेंक दिए।

मगरमच्छ ने खाए — और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। इतना मीठा उसने पहले कभी नहीं चखा था।

"और मिलेंगे?" उसने पूछा।

"रोज़ आओ," बंदर ने कहा। "यहाँ दोनों के लिए काफी है।"

और बस — एक दोस्ती शुरू हो गई।

हर शाम मगरमच्छ आता, बंदर जामुन गिराता, और दोनों बातें करते — नदी की, जंगल की, मछलियों की, बारिश के स्वाद की। तारे निकलने तक बातें चलती रहतीं।

पर घर पर मगरमच्छ की पत्नी थी।

जब उसने जामुन के पेड़ की बात सुनी, तो उसके मन में एक ही ख़याल आया — अगर बंदर रोज़ इतने मीठे जामुन खाता है, तो उसका दिल तो शहद से भी मीठा होगा। मुझे वो दिल चाहिए।

उसने पति से कहा — बंदर को घर ले आओ। किसी भी तरह।

मगरमच्छ बेचैन हो गया। वो अपने दोस्त के साथ धोखा नहीं करना चाहता था। पर पत्नी ने न खाना छोड़ा, न सोना — और रोती रही। आख़िरकार वो टूट गया।

 

अगली शाम वो पेड़ के पास आया। चेहरे पर मुस्कान थी — पर आँखों में नहीं।

"दोस्त," उसने कहा, "मेरी पत्नी ने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। वो तुमसे मिलना चाहती है, और तुम्हारे लिए खाना बनाना चाहती है। आओ मेरी पीठ पर बैठो — मैं तुम्हें उस पार ले चलता हूँ।"

भोला बंदर खुशी-खुशी कूदकर उसकी पीठ पर बैठ गया।

नदी के बीच पहुँचे तो मगरमच्छ धीमा पड़ गया। एक भारी साँस ली।

"दोस्त, मुझे सच बताना होगा। मेरी पत्नी को तुम्हारा दिल चाहिए। मुझे माफ करो। मेरे बस में कुछ नहीं।"

A worried monkey sits on a crocodile's back in the middle  of a wide river, as the crocodile confesses his betrayal

बंदर का दिल धक् से हुआ।

पर वो घबराया नहीं। तीन गहरी साँसें लीं। और सोचा।

"अरे!" वो बोला — माथे पर हाथ मारते हुए। "तूने पहले क्यों नहीं बताया? मैं अपना दिल हमेशा घर पर छोड़ आता हूँ। सफ़र में साथ नहीं रखता — बहुत क़ीमती है। वापस चल, मैं ले आता हूँ।"

मगरमच्छ फ़ौरन पलट गया।

जैसे ही किनारा आया — बंदर एक छलाँग में पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जा बैठा।

"मूर्ख मगरमच्छ," उसने नीचे देखकर कहा। "कोई अपना दिल शरीर से बाहर रखता है भला? जा घर जा। आज तूने एक दोस्त भी खोया — और दिल भी नहीं मिला।"

मगरमच्छ सिर झुकाए धीरे-धीरे चला गया।

और बंदर देर तक उस पेड़ पर बैठा नदी को देखता रहा — यह सोचते हुए कि कभी-कभी जिन पर सबसे ज़्यादा भरोसा होता है, उन्हीं से सबसे ज़्यादा सँभलकर रहना पड़ता है। 

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