बचपन डायरीज़

छत पर क्रिकेट

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The Cricket Match on the Rooftop

हमारे क्रिकेट के अपने नियम थे।
सिर्फ हमारे। कहीं लिखे नहीं थे — पर सबको पता थे।

बाईं तरफ पानी की टंकी के ऊपर से गई तो छक्का। दाईं तरफ गई तो नहीं — वो शर्मा जी के हिस्से में जाती थी। उनसे एक समझौता था। सामने वाली दीवार विकेट थी। और अगर गेंद सीढ़ियों से नीचे चली गई — तो बल्लेबाज़ आउट नहीं, रिटायर्ड। यह फर्क बहुत ज़रूरी था। करीबी मैचों में तो बहुत ज़्यादा।

हम आठ थे। कॉलोनी के। नौ से चौदह साल के।

कोई कप्तान नहीं था — पर एक समझ थी जो बिना बताए सबको थी। बड़े ज़्यादा देर बल्लेबाज़ी करते थे। छोटे दीवारों के पास फील्डिंग करते थे। उस वक्त यही सही लगता था।

गेंद हमेशा टेनिस बॉल थी।

एक बार — 1997 की गर्मियों में — लेदर बॉल से खेले थे। वो मेहता जी के AC पर जा गिरी थी। AC को क्या हुआ यह कभी ठीक से पता नहीं चला — पर छत तक हमारी पहुँच कुछ दिनों के लिए बंद हो गई थी। उसके बाद से टेनिस बॉल। हमेशा।

तीन खिड़कियाँ टूटी थीं उन सालों में।

हर बार एक ही तरीका। सब ठिठक जाते। एक पल के लिए साँसें रुकतीं। फिर सब धीरे से विक्रम की तरफ देखते।

विक्रम बड़ों से बात करने में माहिर था। दो बार पहले भी उसने यह साबित किया था कि खिड़की हवा से टूटी है।

उसकी यह काबिलियत हम पर बर्बाद हुई। वकील बनना चाहिए था उसे।

The Cricket Match on the Rooftop

कभी-कभी उस छत की याद आती है।

खासकर वो — जब सूरज ढलने लगता था और मैं दूर छोर पर फील्डिंग करता था। नीचे पूरी कॉलोनी दिखती थी। दर्जन भर रसोइयों से खाने की खुशबू ऊपर आती थी। दिल्ली की वो खास नारंगी शाम। और जब बल्ला गेंद से सही तरह लगता था — एक पल के लिए सब चुप हो जाते थे। बस देखते थे कि गेंद कहाँ जाएगी।

उसके बाद बहुत जगहें देखी हैं। कुछ ज़्यादा खूबसूरत भी। कुछ ज़्यादा बड़ी भी।

पर वो वाला एहसास — कि मैं बिल्कुल सही जगह हूँ, कि दुनिया थोड़ी देर के लिए ठीक-ठीक वैसी है जैसी होनी चाहिए — वो फिर कभी नहीं आया।

विक्रम अब बंगलोर में है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर।

शर्मा जी का क्या हुआ — नहीं पता।

छत पर शायद अब मोबाइल टावर लगा होगा।

पर वो क्रिकेट मैच अभी भी कहीं चल रहा है — वक्त के किसी ऐसे हिस्से में जहाँ मैं वापस नहीं जा सकता। पर कभी-कभी — बस थोड़ा सा — सुनाई देता है।

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