गर्मी की छुट्टियाँ होती थीं — और एक ही काम होता था।
सूटकेस निकालो।
वो बड़े भूरे सूटकेस जो खटिया के नीचे पड़े रहते थे। जिनके ताले का नंबर किसी को याद नहीं था। इसलिए वो हमेशा खुले ही रहते थे — और इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता था।
रिपोर्ट कार्ड मिलता था। जल्दी से उल्टा करके बैग में।
फिर ट्रेन।
शताब्दी में छह घंटे। बीच में एक जंक्शन जहाँ कोयले और चाय की खुशबू थी। फिर एक छोटी ट्रेन — खिड़कियाँ जो ठीक से बंद नहीं होती थीं, और बाहर से लाल मिट्टी आती थी। बालों में, मुँह में, आधे खाए पारले-जी पर।
पर जब ऑटो उस गली में मुड़ता था —
नानी की आवाज़ पहले आती थी। दिखती बाद में।
"आ गए! आ गए!"
हर बार। जैसे पहली बार हो।
घर वैसा ही होता था। हमेशा।
आँगन में तुलसी का पौधा — जिसे नाना हर सुबह इस तरह पानी देते थे जैसे कोई बड़ा काम हो। रसोई में तीन पंखे पूरी रफ्तार से। नानी सूती साड़ी में — थोड़ी नम, काम की वजह से — आठ लोगों के लिए खाना बनाती थीं। प्रेशर कुकर की सीटी जो बताती थी — खाना तैयार है।
कज़िन होते थे।
चार। कभी पाँच। एक साल सात थे — मुंबई वाले भी आ गए थे।
आते ही झगड़ा। दस मिनट बाद यारी। उसके बाद हम एक-दूसरे के बिना कहीं नहीं जाते थे।
रात को छत पर बैठते। आसमान देखते। अँधेरे में पानी की टंकी छूने की हिम्मत लगाते। अखबार के ठोंगे में भुना चना खाते।
नीचे बड़े चारपाई पर बैठकर बातें करते थे। धीमी। लंबी। हम सुनने वाले नहीं थे — पर कान लगाए रहते थे। पाँच में से एक शब्द समझ आता था। पर जो समझ आता था वो काफी था।
नाना हर सुबह एक सिक्का देते थे।
पुराने वाले — भारी, जिन पर नक्शा था।
उस एक सिक्के को हम खींचते जितना हो सके। इमली की गोलियाँ। या तीन टॉफी और एक माचिस जिसमें अंदर कुछ मिलता था। या — सबसे समझदारी वाला — रूह अफ़ज़ा। इतने पानी में मिलाते थे कि बस गुलाबी रंग का एहसास रहता था।
वो गर्मियाँ हमेशा के लिए लगती थीं।
यानी छह हफ्ते। फिर खत्म।
उस वक्त नहीं पता था कि इन्हीं दिनों को बाद में बार-बार ढूँढूँगा। उस रसोई की खुशबू। पंखों की आवाज़। जाली से होकर आने वाली दोपहर की धूप।
सब कुछ कहीं जमा होता रहा था।
उस वक्त नहीं पता था — वो जगह कहाँ है।
अब पता है।